साथ (उपन्यास)

 



 

साथ
उपन्यास

 

 

दुःख छिपा सकूँ, सुख बाँट सकूँ
तन–मन का साथ पाकर  दुःख में भी रम सकूँ!

 

 

सरण रा

 

 

 

 

 

कृति  : साथ
विधा  : उपन्यास
उपन्यासकार : सरण रा

सर्वाधिकार : © उपन्यासकार के पास सुरक्षित

 

 

 

समर्पण

 

मनुष्य होकर जन्म लेकर भी
सही सोच न बना सकने वाले,
दूसरों की सोच और नियंत्रण में
दास बने हुए
और दास बनाए जा रहे
सामान्य, साधारण, आम ज़मीनी लोगों के लिए—

उन सामान्य, साधारण, आम ज़मीनी लोगों को
प्रेम, आस्था, सम्मान और श्रद्धा सहित

सदैव
साथ… साथ

 

 

 

 

उपन्यास की विषय-सूची

प्रारम्भ : संवाद

अध्याय— पहला : बढ़ते–बढ़ते

1.    माँ

2.    बड़ी बहन

3.    किनारे ही किनारे

4.    रहस्यमय आश्रम

5.    नई बस्ती

अध्याय— दूसरा : पौधा घना होता हुआ

1.    शहरी चकाचौंध

2.    दाम्पत्य सुख

3.    चुनाव

4.    कोरोना (कोविड–19)

5.    अनुभव और अनुभूति

6.    तन और मन

7.    जीवन के चरण

अध्याय— तीसरा : उल्टा रास्ता, सही रास्ता

1.    दल–बल

2.    अवसान

3.    उल्टा सही रास्ता

4.    सोच, साथ और नए युग का उदय

5.    उपसंहार

 

प्रारम्भ

संवाद

 

कौन हमेशा साथ देता है? क्या हमेशा किसी का साथ मिलता है?” — मन।

किसी न किसी का और कुछ न कुछ का सहारा पाकर ही जीवन चलता है। जब तक मैं हूँ, तब तक तुम हो। मैं और तुम साथ रहें, तभी जीवन चलता है। शरीर का सहारा मन है, मन का सहारा शरीर। शरीर का उत्तर।

मन जब बेचैन होकर भटकता है, तो शरीर सूखने लगता है। आँसू टपकाते हुए रोता हुआ शरीर कहता है—
ऐ मन, मजबूत बन। तू मजबूत होगा तभी मैं रहूँगा।

मैं दुखी हूँ। दुख के समय तेरी सीख नहीं सुनना चाहता। भटककर अंत होना चाहता हूँ।

अंत तो होगा ही—यह क्षणभंगुर देह है। जब तक देह है, मैं शरीर और तू मन मिलकर एक सुंदर सृष्टि की रचना करें। सुंदर सृष्टि रचकर अंत को मात दें। है न?”

शरीर और मन एक-दूसरे को देखते हैं। एक का प्रतिरूप दूसरे के दर्पण में साफ दिखाई देता है।
यदि मन सोच, समझ, अनुभूति, भावना, आनंद और गंतव्य है, तो शरीर व्यवहार, प्राप्ति, अनुभव, अस्तित्व, यथार्थ और आनंद भी है।
मन समझता है। मन समझते ही शरीर स्वस्थ होता है।
मन और शरीर एकाकार होते हैं। दोनों नई सृष्टि रचने में लग जाते हैं।

सृष्टि-रचना से बुना हुआ
यह मन द्वारा शरीर को और शरीर द्वारा मन को दिया गया
कुछ न कुछ का,
किसी न किसी का श्रेष्ठ साथ!

एक मन और शरीर के अंत के बाद फिर दूसरा शरीर और मन जन्म लेते हैं।
मन के दुख की बातें और मन के पीछे भागते हुए विवश शरीर के सूखने की बातें दोहराई जाती हैं।
शरीर की पुकार! मन का खेल!
शरीर और मन का बार-बार दोहराता द्वंद्व और साथ…
साथ-साथ जीने वालों का दिया हुआ,
मरने वालों का भी दिया हुआ—
निरंतर चलती रहने वाली क्रमिकता ही साथ है!

 

अध्याय — पहला

बढ़ते हुए

1. माँ

दुख छिपा सकूँ,
सुख बाँट सकूँ!

माँ कहा करती थीं।

सुख उनके जीवन में कभी उगा ही नहीं। बहुत सुख बाँट न सकीं। दुख—भयावह दुखों से भरा जीवन! दुख छिपाने के लिए वे हमेशा संघर्ष करती रहीं। स्वयं दुखी रहकर भी पति, बच्चों और पड़ोसियों को सुखी रखती रहीं।

वह माँ की पहली संतान थी। माता-पिता दोनों ने प्रेम से पाला। दोनों ही गरीब भूमिहीन परिवारों से थे। कहाँ, कैसे मिले—शादी हुई।

रहने को घर नहीं था। नदी किनारे दस भूमिहीन परिवारों ने मिलकर सरकारी ज़मीन पर बस्ती बसाई। खंभे गाड़कर छप्पर डाला—वही घर। उसी घर में सुख-दुख के दिन काटते हुए कई वर्ष बीत गए। फिर एक भाई और एक बहन हुए—पाँच जनों का परिवार।

महान परिवार—साझा सुख-दुख। एक हँसे तो सब हँसें, एक दुखी हो तो सब दुखी। साझा हँसी, साझा रुदन—परिवार महान!

परिवार के प्रेम-मोह में लोग कितने ही कष्ट सहकर कठिन परिश्रम करते हैं—परिवार की उन्नति और सुख के लिए।

माँ—
सबकी केंद्र। भूख लगी—माँ। प्यास लगी—माँ। बीमारी में—माँ। शीतल छाया, धूप में गरमाहट। हर दुख, पीड़ा, रोग, भूख और शोक से उबारने वाली संजीवनी। माँ सब कुछ।

उसे पढ़ाने की शर्त पर नदी से ऊँचे एक छोटे बाज़ार में सुबह-शाम घर का काम कराने भेजा गया। उसी वर्ष बरसात में कई दिन-रात की भारी वर्षा से ऐसी बाढ़ आई, जो पहले कभी नहीं आई थी। नदी किनारे की पूरी बस्ती बह गई—उसके प्यारे माँ-बाप और छोटे भाई-बहन सहित सभी लोग। वह दूसरों के घर होने के कारण बच गया।

खबर मिलते ही वह भीगता हुआ नदी किनारे पहुँचा। रेत का मैदान ही नहीं, उससे ऊपर तक बाढ़ फैली थी। एक बड़े पत्थर पर खड़ा वह उस जगह को देखता रहा जहाँ उसका घर था—अब कोई निशान नहीं।

माँ!—अनायास उसके मुँह से निकल पड़ा। आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
बाबू, रोते भाई, नन्ही बहन!—वह विचलित हो उठा। क्या करे? कैसे करे?
कितना सुखी परिवार था उसका! अब किसे माँ कहे?

निथरकर भीगा वह नदी को कोसता है, उफनती बाढ़ को देखता रहता है। भीतर का दुख, पीड़ा और विरह उसे जलाने लगता है—
अब माँ के बिना इस संसार में जीना क्यों?

वह छलाँग लगाता है—पर एक मजबूत हाथ उसे थाम लेता है। वह बच जाता है।
क्या करने जा रहा था, बखते!—बड़ी बहन की डाँट से वह चौंकता है

 

२. बड़ी दीदी

दूध-सा कोमल मन,
ज़रा-सी ठेस में गहरे निशान।

बड़ी दीदी उस घर की सबसे बड़ी बेटी थी जहाँ वह रहता था—अभी-अभी पंद्रह वर्ष की होने वाली। घर में केवल बड़ी दीदी, छोटा भाई और माता-पिता थे। माता-पिता बाज़ार में स्थित दुकान की देखरेख में व्यस्त रहते थे, इसलिए घर के छोटे-मोटे कामों के लिए बखते को रखा गया था।
अपना घर छोड़कर आने पर उसे बहुत तन्हाई लगी थी, लेकिन बड़ी दीदी के स्नेहपूर्ण व्यवहार ने उसे ढाढ़स दिया। अनजाने ही उसके भीतर बड़ी दीदी के प्रति अपनापन जन्म ले चुका था।

यदि बड़ी दीदी न होती, तो वह भागकर अपने घर लौट गया होता। बड़ी दीदी और पढ़ाई—इन्हीं दो कारणों से वह रुका हुआ था।
पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना, घर के काम मन लगाकर करना। हम तुम्हें अपने घर में रखकर पढ़ा नहीं सकते। सुबह-शाम घर के छोटे काम करके पढ़ाई मिल सके, इसलिए तुम्हें कान्छा साहू के घर भेज रहे हैं। तुम्हें अपने पास रखने का मन तो है, पर… क्या करें?”
माँ की यह बात—आँखों में आँसू और लंबी साँस के साथ कही गई—बखते की आँखों के सामने तैर जाती है।

कुछ देर पहले तक हिचकियाँ भर-भरकर रो रहा बखते, बड़ी दीदी का हाथ पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगता है।
माँ-बाबू, भाई-बहन—सब बह गए। अब मेरा कोई नहीं रहा। मैं अकेला हो गया, बड़ी दीदी…

मैं हूँ, बखते! मैं हूँ—तेरी दीदी। मैं तुझे अकेला नहीं होने दूँगी।

बखते और ज़ोर से रोते हुए बड़ी दीदी की गोद में सिमट जाता है। बड़ी दीदी भी प्रेम से उसे थपथपाती है।
बखते, बहुत मत रो। जितना भी रोओ, वे लौटकर नहीं आएँगे। नदी उन्हें कहाँ बहा ले गई—किसे पता? अगर शव भी मिलना होता, तो… बहे हुए भी सात-आठ घंटे हो चुके हैं।
कहती तो बड़ी दीदी है, पर उसकी आँखों से भी आँसू बहने लगते हैं।

बड़ी दीदी, चलो लाशें ढूँढने चलें!
बड़ी दीदी का सहारा पाकर बखते के भीतर यह साहस जाग उठता है।

कहाँ जाएँगे? मूसलाधार बारिश हो रही है। सारे गाँव वाले खोज चुके हैं। मिलतीं तो खबर आ ही जाती।

निथरकर भीगा बखते रोते हुए उफनती बाढ़ को देखता रहता है। मूसलाधार वर्षा—बड़ी दीदी छाता ओढ़े होने पर भी पूरी तरह भीग चुकी है।

चलो बखते, घर चलें।
वह उसका हाथ पकड़कर ले जाना चाहती है, पर बखते नहीं मानता।
अगर तू यहीं बैठेगी, तो मैं भी यहीं बैठूँगी। मैं तुझे अकेला नहीं छोड़ूँगी।

बखते कुछ नहीं बोलता। बस तेज़ी से बहती बाढ़ को देखता रहता है। कहाँ था उनका घर? कहाँ हैं उसके माँ-बाबू और भाई-बहन?

रोना—असहनीय पीड़ा में मन को थामने का एकमात्र उपाय।
काफी देर तक दोनों रोते रहते हैं। अंत में बड़ी दीदी कहती है—
बखते भाई, अब रोने से क्या होगा? तेरे माँ-बाबू और भाई-बहन लौटकर नहीं आएँगे। ज़रा याद कर—तेरी माँ ने तुझे हमारे घर भेजते समय क्या कहा था? ‘पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।’ समझा?”

पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनना।
बखते मन-ही-मन इस वाक्य को दोहराता है। हाँ, माँ ने यही कहा था। घर से दूर भेजना उन्हें अच्छा नहीं लगता था, पर बेटे के भविष्य के लिए दिल तोड़कर उन्होंने बखते को कान्छा साहू के घर भेजा था।

 

कहाँ जा रहा है?”
कहीं जाने को उठे बखते से बड़ी दीदी पूछती है।

बाहर… पेशाब करने।
फिर नदी की ओर जाएगा? मैं भी साथ चलूँगी।
नहीं… मुझे शर्म आती है।
किस बात की शर्म दीदी से? अभी भी तो तू लगभग नदी में कूद ही गया था। मैं तुझे मरने नहीं दूँगी।
सच में… बस पेशाब करने ही।
तो पहले कसम खा—आत्महत्या नहीं करेगा, पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा—तभी जाने दूँगी।

 

कान्छा साहू के घर के अन्य लोग भी बखते के साथ सहानुभूतिपूर्ण और स्नेहपूर्ण व्यवहार करने लगे। बड़ी दीदी तो उसे अपने पास ही रखती, साथ चलती और अपने ही कमरे में सुलाती। उसे डर था कि कहीं बखते का मन भटककर नदी में न कूद जाए।

तीन महीने बीत गए। बस्ती के किसी भी व्यक्ति का शव नहीं मिला। उफनती बाढ़ उन्हें कहाँ बहा ले गई—किसे पता? कुछ दिन खोज के बाद गाँव वाले थक गए, सरकार भी। बड़ी-बड़ी घोषणाएँ हुईं, पर पीड़ितों को राहत मिली—ऐसा पता नहीं चला।

बड़ी दीदी द्वारा दिलाई गई कसम के कारण बखते ने नदी में कूदकर मरने का विचार मन में नहीं आने दिया। वह मन को बाँधना सीखने लगा था। उस पर गिरी विपत्तियों को सहने की शक्ति उसमें विकसित होने लगी थी।
जो भी हो, मैं जिऊँगा और माँ का सपना पूरा करूँगा।
उसने ऐसा दृढ़ निश्चय कर लिया था।

बखते बड़ी दीदी को माँ-सा मानने लगा था। सच ही—यदि बड़ी दीदी न होती, तो वह कब का नदी में कूदकर मर चुका होता। इसलिए बड़ी दीदी उसके लिए दूसरी माँ ही थी।

 

माँ से अलग होते समय बखते बहुत उदास था। उसे घर-परिवार छोड़कर जाना बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था। माता-पिता उसे समझाते हुए कहते थे—
बेटा, वहाँ जाएगा तो पेट भरकर खाने को मिलेगा, पढ़ने को मिलेगा। हम तुम्हें घर पर रखकर न तो पेट भर खिला सकते हैं, न पढ़ा सकते हैं। इसलिए तुम्हें कान्छा पसले के यहाँ भेज रहे हैं…

गरीबी।
दिन भर पिता कहीं-कहीं काम की तलाश में जाते थे। शाम को चावल, दाल, सब्ज़ी लेकर लौटते थे। माँ घर में छोटे भाई-बहनों की देखभाल करती हुई, बच्चों को साथ लेकर पास-पड़ोस के घरों में काम करने जाती थी। उसे नदी के पास न जाने की सख़्त हिदायत दी गई थी। पड़ोस के एक बच्चे के नदी में डूबकर मर जाने की बात वे उसे बार-बार समझाते रहते थे।

माता-पिता सोचते थे कि बच्चे बड़े हो जाएँगे तो सुख के दिन आएँगे। छोटे-छोटे बच्चों को पालना कितना कठिन होता है—यह बात बखते का बालमन भी धीरे-धीरे समझने लगा था। घास-फूस की छत और चटाइयों से घिरा घर—भूमिहीन ग़रीबों का सिर छिपाने का ठिकाना।
दिन-रात कड़ी मेहनत करने पर भी पेट भर भोजन न मिलना, तन ढकने को एक ढंग का कपड़ा तक न होना—ऐसी थी उन ग़रीब भूमिहीनों की ज़िंदगी।

वहाँ अमीर लोग केवल मज़दूर खोजने आते थे। बाज़ार के पास होने पर भी वह बस्ती बिल्कुल उपेक्षित थी—जहाँ सुख की कोई किरण नहीं पहुँचती थी। सुख का अनुभव न होने के कारण वहाँ के बच्चों के मन में यही बैठ गया था कि ग़रीबी ही जीवन है। बखते परिवार छोड़कर जाना नहीं चाहता था।

स्कूल की छुट्टी में हमसे मिलने आ जाना। कान्छा पसले का घर तो पास ही है। तुझसे मिलने हम भी आते रहेंगे।
माँ ने यह बात बहुत उदास मन से कही थी। वह कई बार छोटी बहन को पीठ पर उठाकर और भाई को उँगली पकड़ाकर उससे मिलने आई भी थी।
आह! माँ…
बखते के भीतर से एक गहरी साँस निकलती है—
माँ! अब तुम्हें कहाँ जाकर ढूँढूँ?

माता-पिता की बात मानकर कान्छा पसले के घर आने का पहला दिन उसे याद आता है। नया घर, सब अनजान चेहरे। उसे छोड़ने पिता स्वयं कान्छा पसले के साथ आए थे। लौटते समय पिता ने अपने धोती के पल्लू से आँसू पोंछे थे। वह दृश्य देखकर बखते की आँखों से भी ख़ून जैसे आँसू बह निकले थे।

उसे देखने बड़ी दीदी, छोटा भाई और साहूनी इकट्ठा हो गए थे।
बड़ी दीदी में ऐसा क्या था—पता नहीं—वह उनकी ओर खिंच गया। उनकी जवानी अभी खिल ही रही थी, होंठ जैसे मुस्कुराने को आतुर, आँखें चंचल—वह उसे देखकर मुस्कुरा दी थीं। बखते भी अनजाने में मुस्कुरा उठा था। उसे बड़ी दीदी को देखकर सचमुच खुशी महसूस हुई थी।

बड़ी दीदी उससे मीठे बोल में बात करती थीं—स्कूल में क्या करना चाहिए, कैसे पढ़ना चाहिए, लोगों से कैसे बात करनी चाहिए—सब सिखाती थीं। वह उनसे घुल-मिल गया था और उन्हें अपनी सगी दीदी मानने लगा था। अद्भुत आत्मीयता, अपनापन और साथ!

 

उफनती बाढ़ में बहती हुई माँ, पिता और छोटे भाई-बहन।
कभी-कभी छाती से ऊपर उनका शरीर झलकता हुआ दिखाई देता—माँ के उठे हुए हाथ, माँ कुछ चिल्ला रही है, पर कुछ सुनाई नहीं देता। बाढ़ के ऊपर उठते हाथ…

बखते हड़बड़ा कर जाग उठता है। पसीने से भीगा हुआ, मन व्याकुल, कुछ न कर पाने की घबराहट के साथ वह जकड़न-सी महसूस करता हुआ उठ बैठता है।

सिर्फ़ सपना था…
वह मन-ही-मन कहता है। कैसा सपना? बार-बार आने वाला सपना। माँ-बाप और छोटे भाई-बहनों को याद करते-करते सिसक-सिसक कर रोते-रोते सो जाने के कारण ऐसे सपने उसे अक्सर आते रहते थे।

या सचमुच माँ ने पुकारा था?

अब इस दुनिया में उसका है ही कौन? माँ, पिता, छोटे भाई-बहन—कोई नहीं। ननिहाल के बारे में उसे कुछ पता नहीं। वह अकेला है—पूरी तरह अकेला।
क्या माँ ने अपने असीम प्रेम से उसे पुकारा था?
अगर वह भी उस दिन दुकान पर न होता, तो उनके साथ ही बह गया होता। तब उसे भी किसी की तरह जीवित रहकर बिछोह का यह भयानक दुःख, अकेलेपन का रोना और आहें नहीं झेलनी पड़तीं।

अब भी वह नदी में कूदकर इन भारी दुखों को हमेशा के लिए मिटा सकता है।
या फिर नदी की ओर जाकर, उसमें छलाँग लगाकर अपने परिवार के साथ ही लुप्त हो जाए?

उसके मस्तिष्क में अनजाने द्वंद्व की भँवर उठती रहती।
क्या करूँ?
अकेले कैसे जियूँ?
माँ-बाप और भाई-बहनों के उस सुखी परिवार को भूल न पाने के कारण उसके मन में तरह-तरह के उलटे-सीधे, शुभ-अशुभ विचार उमड़ते रहते।

नहीं, मैं बिल्कुल अकेला भी तो नहीं हूँ!
भले ही मेरे अपने माँ-बाप और सगे भाई-बहन न हों, लेकिन मुझे प्यार करने वाली बड़ी दीदी तो हैं। उन्हीं के कारण मैं ज़िंदा हूँ।
पर अगर मैं यहाँ रहा, तो एक न एक दिन नदी मुझे निगल लेगी। परिवार को याद करते-करते मैं उसमें कूद जाऊँगा।
मरना या जीना—मुझे एक चुनना ही होगा। बड़ी दीदी भी कब तक बचा पाएँगी?
अगर जीना है, तो मुझे यहाँ से कहीं बहुत दूर चला जाना होगा।
पर कहाँ? किस ओर? कितनी दूर?”

ऐसे ही विचारों में बखते उन दिनों डूबा रहता था।

 

 

बखते भाई!
जी, बड़ी दीदी।

मैं तुझे अपना सगा भाई मानती हूँ। मैं भी अकेली हूँ… चाहती थी कि जीवन भर भाई का साथ मिले।

बड़ी दीदी, अकेला तो मैं हूँ। मेरा कोई नहीं। आपके तो माँ-बाप और भाई हैं।

सिर्फ़ पिता ही मेरे अपने हैं। माँ सौतेली है—छोटी माँ। भाई भी उसी का बेटा है। और पिता भी अब पहले जैसे नहीं रहे।

कैसे?”

मेरी माँ भी वहीं नदी में नहाते समय डूबकर मर गई थीं, जहाँ तुम्हारा परिवार बह गया था। माँ की मृत्यु के बाद पिता दूसरी शादी कर लाए। अब उनका सारा ध्यान उसी पर और भाई पर है। इसलिए मैं भी अकेली हूँ। तुम्हें पाकर मुझे लगा, जैसे अपना ही भाई मिल गया हो। लेकिन…

लेकिन क्या, बड़ी दीदी?”

अभी छोटी माँ ने मुझे डाँट-डपट कर मारा। बोली—बखते को ज़्यादा मत चाटो। ‘कुत्ते को प्यार करो तो मुँह चाटने लगता है।’
वह तुम्हें अपने कमरे में क्यों सुलाती है? बाहर बरामदे में सुलाओ। क्या वह तुम्हारा पति है? इतना प्यार क्यों करती हो?
मुझे भी बहुत गुस्सा आ गया और मैंने कह दिया—वह मेरा भाई है। पति कहती हो तो पति ही सही।
बस यही कहना था—उन्होंने थप्पड़ मार दिया, बाल नोचते हुए बोलीं—इतनी कम उम्र में ही पति चाहिए? और धमकाया कि अगर तेरे बाप को बता दिया तो तेरा क्या हाल करेंगे!
बखते, मैं यहाँ नहीं रह सकती। आधा पेट खाकर भी सही, मैं ननिहाल चली जाऊँगी। अगर मामा-मामी ने माना, तो तुझे भी अपने साथ ले जाऊँगी।

यह कहते-कहते बड़ी दीदी रो पड़ीं।

बखते भी रोने लगा। उसके जीने का एकमात्र सहारा—बड़ी दीदी—भी रो रही थीं।
यह क्या हो रहा है?
बखते से प्रेम करने वाले एक-एक कर डूबते जा रहे हैं। बड़ी दीदी भी उससे दूर होती जा रही हैं।

बड़ी दीदी से बिछड़ने से पहले ही बखते कान्छा साहू का घर छोड़कर निकल पड़ा।
उसे जाते देख बड़ी दीदी चिल्लाकर बोलीं—
कहाँ जा रहे हो, बखते? आत्महत्या नहीं करोगे—यह जो कसम खाई थी, याद रखना। कैसी भी विपत्ति आए, जीना है। लौट आना… मैं इंतज़ार करूँगी…

वह और भी बहुत कुछ कहती रहीं।
पर बखते बिना सुने तेज़ी से आगे बढ़ता चला गया।

 

३. किनारै किनार

 

नदी बहती रहती है, किनारा हमेशा किनारा ही रहता है।
जीवन–यात्री भी बालू के मैदान में किनारे की तरह ही छटपटाता रहता है।

 

जीवन एक निरंतर चलना है, एक निरंतर भोगना है। बेसुध-सा बखते चलता गया। न कोई गंतव्य था, न कोई उद्देश्य—क्योंकि उसके पास सोचने की शक्ति भी नहीं बची थी। वह नदी के किनारे-किनारे चलता ही रहा, चलता ही रहा।

घोर अँधेरा छा गया। कुछ भी दिखना बंद हो गया तो वह एक चिकने पत्थर पर लेट गया। सुबह पक्षियों की चहचहाहट और नदी की कल-कल से उसकी नींद खुली। चारों ओर देखा। वह डर गया—
मुझे जितनी जल्दी हो सके इस नदी से दूर जाना होगा!

जिस तरह नदी ने मेरे परिवार को निगल लिया, वैसे ही मुझे भी निगल सकती है। मुझे ज़िंदा रहकर पढ़ना है, बड़ा आदमी बनना है और माँ का सपना पूरा करना है। दुख, अभाव और गरीबी झेल रहे लोगों के मन में सोच का नया पौधा रोपकर उजाला उगाना है!

ऐसी ही सोचते हुए वह तेज़-तेज़ चला, दौड़ा—किनारे से बहुत दूर… सोच और सहारे के बिना वह चलता रहा। चलता रहा—अकेला ही अकेला! चलता रहा या भटकता रहा…

वह चलता ही रहता है। चलना आसान नहीं था। नदी से दूर भागते हुए कभी वह खड़ी चट्टानों पर चढ़ता, तो कभी काँटों से उलझे झाड़ियों-जंगलों से होकर गुजरता। चलते-चलते दिन कैसे बीत गया, उसे पता ही नहीं चला। शाम ढलते ही वह उलझन में पड़ गया—कहाँ ठहरे? क्या खाए? भूख लगते ही थकान का एहसास हुआ। आगे का रास्ता दिखता नहीं। वह एक चिकने पत्थर पर बैठा, लेटा और थककर अनजाने ही सो गया।

आधी रात को उसकी नींद खुली। चारों ओर सन्नाटा और घोर अँधेरा। चिल्लाते सियार, बाघों-सिंहों की गर्जना सुनकर चुप हो जाते हैं। जंगल में सिंह, बाघ, भालू, लकड़बग्घे, सियार जैसे हिंसक जानवर भरे पड़े हैं।
कहीं मुझे भी मारकर खा न जाएँ!—वह डर गया।

अगर खा ही लें—जिसका कोई अपना नहीं, उसे खा लें—तो दुख भी खत्म हो जाएगा। मन को समझाते हुए वह ठंड से पत्थर की ओट में सिकुड़कर बैठा रहा। कहाँ जाए? चारों ओर घुप अँधेरा। भागे भी तो किधर? कुछ दिखता नहीं। जो होगा, होगा…

अँधेरे में थोड़ी दूर एक जोड़ी आँखें चमक रही थीं—गुलुप-सी। गुर्राने की आवाज़ के साथ वे आँखें पास आती जा रही थीं।
बस, इतना ही था मेरा जीवन—बखते ऐसा सोच ही रहा था कि अचानक पूरे जंगल में जानवरों के भागने-दौड़ने की आवाज़ गूँज उठी। सब भाग गए। क्यों भागे? वे चमकती आँखें भी गायब हो गईं। सिंह ने जंगल को थर्रा देने वाली दहाड़ लगाई थी, इसलिए सब भागे थे। सिंह आया तो… बखते के होंठ सूख गए, दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।

मरना कौन चाहता है? जीने की तीव्र चाह में जीवन का मोह कितना विशाल होता है—यह बखते ने जाना।
अगर जी पाया…—वह सोच ही रहा था कि भोर की हल्की रोशनी फैलने लगी और कुछ-कुछ दिखने लगा। मुझे किसी सुरक्षित जगह की ओर भागना चाहिए—यह सोचकर वह जहाँ रास्ता मिला, उधर ही चल पड़ा। रात भर जंगल को थर्राने वाले जानवर कहाँ गए? चारों ओर सन्नाटा था। बिना आवाज़ किए चलने की कोशिश करता, मगर सूखे पत्तों के कुचलने की आवाज़ से डरता कि कहीं बाघ या भालू न आ जाएँ। वह मानव बस्ती की ओर जाना चाहता था, पर अनजाने में और भी भीतर जंगल की ओर बढ़ता जा रहा था।

जंगल और भी घना, और भी सघन—एक-दूसरे में उलझी लताएँ; जितना चलता, उतना ही जंगल। वह चलता ही रहा…

चलते रहना ही जीवन है। चलते-चलते ही मानव बस्ती तक पहुँचा जा सकता है—इसी सोच के साथ वह चलता रहा। चलते-चलते भूखा-प्यासा वह जंगल में ही अर्ध-बेहोश होकर गिर पड़ा।

उसे ऐसा लगा जैसे कोई उसे उठाकर ले जा रहा हो। है या नहीं—इसी उहापोह में वह पूरी तरह बेहोश हो गया।

 

४. रहस्यमय आश्रम

 

रहस्य के भीतर ही रहस्य, रहस्यों में ही उलझा हुआ,
समझ सको तो एक क़दम और आगे बढ़ सको।

 

यह कौन-सी जगह है?” होश में आने पर बखते ने समझने की कोशिश की, पर समझ नहीं सका। पूछने के लिए कोई दिखाई नहीं दे रहा था।
मैं यहाँ कैसे आ पहुँचा?” उसने मन-ही-मन खुद से पूछा। अर्ध-बेहोशी में उसे ऐसा लगा था जैसे किसी ने उसे उठाकर यहाँ तक पहुँचाया हो। मुझे उठाने वाला कौन होगा? यह कैसी जगह है?”—वह मुश्किल से उठकर चारों ओर देखने लगा।

बखते को बहुत ज़ोर की भूख लगी थी। थोड़ी दूर उसे उबली हुई कंद-मूल दिखी। उसने खाया और प्यास बुझाने के लिए कल-कल बहती छोटी धारा तक गया, हथेलियों से पानी उलीच-उलीच कर जी भरकर पीया।
मैं तो अब बच गया, लेकिन मुझे फिर जीवन देने वाला कौन है?”—वह सोचता रहा।

पास ही एक दूसरी झोपड़ी से कभी कोलाहल, कभी रोने-जैसी, कभी डाँट-फटकार-सी आवाज़ें आ रही थीं। प्रार्थना हो रही हो—ऐसा भी लग रहा था। पुरुष, स्त्री और बच्चों की सामूहिक आवाज़ें भी सुनाई देती थीं। वहाँ क्या हो रहा है—बखते कुछ समझ नहीं पाया। इसी उलझन में एक धूल-मिट्टी से सना, हट्टा-कट्टा जवान लड़का आया और बोला, “होश आ गया?”
हाँ…—उसे देखकर बखते डर गया। दिखने में डरावना था, पर उसकी बोली नरम थी—उसने सोचा।
मैं यहाँ कैसे आ पहुँचा?”
मैं ही तुम्हें बेहोशी में उठाकर लाया था।
यह कैसी और कौन-सी जगह है?”
यह घने जंगल के भीतर स्थित, एकांत में उच्च साधना करने वाला सुंदर, रहस्यमय आश्रम है।
यहाँ क्या किया जाता है?”
आराधना, साधना और अभ्यास।
किस तरह का?”
ज़्यादा मत पूछो, ज़्यादा मत सोचो। अभी-अभी होश आया है। पहले स्वस्थ हो जाओ—सब खुद-ब-खुद जान जाओगे।

वह आदमी खाने-पीने की चीज़ें दिखाकर दूसरी झोपड़ी की ओर चला गया। बखते कई दिनों का भूखा-प्यासा था—वह खाने में लग गया। बहुत समय बाद बहुत खाया था, शायद इसलिए वह धीरे-धीरे ऊँघता-सा बेहोश हो गया—या सो गया।

 

रहस्यमय आश्रम के बारे में उसे धीरे-धीरे पता चलने लगा। वहाँ कुल २६ लोग थे; उसके जुड़ने से २७ हो गए। आश्रम में रहे या न रहे—वह तय नहीं कर पा रहा था। वहाँ से जाए भी तो कहाँ? चारों ओर जंगल और हिंसक जानवर। मजबूरी में बखते वहीं रहा। जब तक वहाँ रहता, वह जीवित रह सकता था—जीना सबसे बड़ा था। जिए तो दुनिया दिखती है।

यहाँ से मानव बस्ती तक कैसे पहुँचा जाए—यह जानने की कोशिश करनी चाहिए—उसने सोचा।

शुरू-शुरू में उसे योग सिखाए गए। योग करने से समय कटने लगा। वह योगों में निपुण होता गया।
अब तुम्हें समाधि सीखनी होगी। महागुरु का आदेश।
समाधि क्या होती है?”—अब तक वह निडर हो चुका था।
खुद जान जाओगे। इतना कहते ही तीन शिष्यों ने उसे जी-भरकर पीटना शुरू कर दिया। उसकी आह-आह से झोपड़ी गूँज उठी। शरीर के मर्म-स्थलों पर भी अंधाधुंध प्रहार हो रहे थे। नाक-मुँह और शरीर के कई हिस्सों से खून बहने लगा। दर्द सह सका तो अंत में बखते बेहोश हो गया। असह्य शारीरिक पीड़ा में बेहोश होना—दुख से बचने का शरीर का अचूक उपाय है; बखते के शरीर ने भी वही अपनाया।

वह पूरा दिन बेहोश रहा। कोई देख रहा था कि उसकी साँस चल रही है या नहीं। रात में बेहोशी में उसका शरीर काँपने लगा, तेज़ बुखार आया और वह बड़बड़ाने लगा—माँ, बाबा, भाई-बहन, बड़ी दीदी… मैं… आ रहा हूँ। वह चीखा और फिर सो-सा गया।

अगले दिन चेतना लौटी। शिष्य ने महागुरु को खबर दी। महागुरु और वे शिष्य आए जिन्होंने उसे पीटा था। उसे डर लगा—कहीं फिर न पीट दें। पर महागुरु ने उसके घाव-नील सहलाते हुए मीठी आवाज़ में पूछा, “अभी भी दर्द है? कैसा लग रहा है?”
शरीर में कटकटाहट थी, फिर भी उसने दर्द नहीं होने का संकेत देने के लिए सिर हिला दिया।
अच्छा, तुम समाधि के योग्य हो गए। चोट-मार-पीड़ा के विरुद्ध तुम्हारे शरीर में प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो गई है—शाबाश, छोटे!—कहकर महागुरु हँसे—हा…हा…हा…
शिष्यों ने भी स्वर मिलाया—हा…हा…हा…

कुछ देर बाद महागुरु बोले—दो दिन आराम करो। फिर समाधि-योग सिखाना शुरू करेंगे।

दो दिन बाद तीसरे दिन वही तीन शिष्य आए—पहले की तरह पीटा, ज़मीन पर पटक-पटक कर खून-लहूलुहान कर दिया। इस निर्दयी पिटाई को सह न पाकर बखते भी क्रुद्ध होकर उन पर टूट पड़ा। जितना हो सका, उसने भी मारा-पीटा। छोटे लड़के की मार उन्हें कुछ लगी नहीं; तब बखते आगे बढ़ने वालों को काटने-नोचने लगा। बालों से लटकाए जाने पर भी वह डंडा उठाकर हमला करता रहा।
शाबाश! अन्याय के विरुद्ध जुझारू क्षमता तुम्हारे भीतर है—हमें प्रसन्नता है। वे हँसते हुए बोले। ज़हरहीन साँप और आत्मसम्मान-हीन आदमी किसी काम के नहीं। तुम जुझारू हो और मृत्युंजय समाधि सीख सकोगे। यह कहकर वे फिर उसे पीटने लगे। बखते भी पलटकर वार करता, गुस्से में झपटता—पर वे बलिष्ठ लोग उसे पीट-पीटकर, मर्म-स्थलों पर प्रहार कर बेहोश कर ही छोड़ते।

कितनी ही बार—पीटना, बेहोश होना, शरीर भर घाव-नील, खून में लथपथ होना—गिनती नहीं। वहाँ से भाग भी नहीं सकता था। थोड़ा संभलते ही, बेहोश होने तक फिर पिटाई चलती।
इस बार तो ऐसा लगा—शायद वह मर ही गया। साँस रुक गई थी, खून बहना भी बंद। शरीर ठंडा, लाश-सा। महागुरु ने छूकर देखा—जीवन का कोई लक्षण नहीं। पानी छिड़का गया। काफ़ी देर बाद ‘मरे’ बखते ने साँस लेना शुरू किया।
सफलता! यह लड़का—समाधि सीखने योग्य दिव्य बालक मिल गया!

 

पीटकर बेहोश होना, अचेत होना, मर-सा जाना और फिर खुद-ब-खुद सँभल आना—बखते के लिए सामान्य होता गया। फिर भी असह्य पीड़ा के कारण वह और आक्रामक होता जा रहा था। कब आकर मारपीट शुरू कर दें—इस डर से वह हमेशा अपने पास डंडा रखने लगा।
वे शिष्य आए। बखते ने भी डंडे से हमला किया। छोटा-सा बखते—तीन बलिष्ठ लोग। उन्होंने डंडा छीनकर, मुक्कों-लातों से पीट-पीटकर उसे बेहोश किया; अचेत अवस्था में गला दबाकर सचमुच मार ही डाला।
कई घंटे बाद ‘मरा’ बखते फिर सँभल आया। उसके भीतर शारीरिक-मानसिक उथल-पुथल तीव्र गति से होने लगी—साधारण नहीं, असाधारण और अलौकिक। चोट-पीड़ा सहने के लिए वह मानसिक-शारीरिक तैयारी में जुटा रहता, मन-तन पर नियंत्रण का प्रयास करता। उसका प्रयत्न, एकाग्रता और आवेग चरम पर पहुँचने लगे। वह शिष्यों से जितना हो सका, लड़ता—और न बन पड़ने पर स्वयं ही बेहोश हो जाता।
स्वतः बेहोश होने की क्षमता विकसित हो गई थी; और कुछ घंटों बाद वह अपने-आप होश में भी आ जाता।

शिष्यों ने यह नई क्षमता महागुरु को बताई। सुनकर महागुरु खुशी से नाच उठे।
हम असीम सफलता की ओर बढ़ रहे हैं। यह अलौकिक उपलब्धि हम सबको अमरता देगी!

 

खुद अचेत-बेहोश होकर फिर सँभल आने की शक्ति दिखते ही आश्रम में उसका सम्मान बढ़ने लगा। खान-पान पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा। वह किसी भी समय महागुरु से मिल सकता था। महागुरु उसे उपदेश और अन्य ज्ञान सिखाते।
अब उसे आश्रम के सभी हिस्सों में आने-जाने की अनुमति मिल गई। स्वयं बेहोश हो सकने के कारण शिष्यों को उसे पीटने की ज़रूरत नहीं रही। सब उसे सम्मान देने लगे।

एक दिन महागुरु, बखते की उम्र की, सजी-संवरी एक युवती को लाए और बोले—तुम इससे संबंध रख सकते हो। मिलकर नई सृष्टि रच सकते हो। अब तुम दोनों साथ रहोगे।
बखते चकित रह गया। वह युवती बत्तीस लक्षणों से युक्त, सुंदर थी—नाम भगवती। इससे पहले कभी बखते के नाम की पूछ नहीं हुई थी।
“‘
बखते’ नाम अब उपयुक्त नहीं। आज से तुम्हारा नाम ‘देवाधिपति’—मैं नामकरण करता हूँ। सब तुम्हें देवाधिपति कहेंगे।
बखते अब देवाधिपति था। महागुरु की आज्ञा से देवाधिपति और भगवती एक ही कमरे में रहते-खाते। उनके बीच प्रेम होना चाहिए—यह आदेश था।
आदेश से भी प्रेम उपज सकता है—यह सुनकर महागुरु प्रसन्न थे।

स्वतः बेहोश या अचेत होकर मरे-से हो सकने की क्षमता उन दोनों में थी। महागुरु का मत था कि यदि प्रयास से, आयु की सीमा तोड़कर संतान जन्मे, तो उसे सर्वशक्तिमान महामानव बनाया जा सकता है। इसी आशा में वे दोनों को न केवल बेहोश होने, बल्कि पूर्ण मृत्यु का अभ्यास भी कराते—मरना, लाश बनना और फिर लौट आना—कठोर समाधि का अभ्यास चल रहा था।

 

कई दिन बीते। बारिश से ऋतु बदली, फिर ठंड आई, फिर वर्षा।
महागुरु के आदेश पर रात में उन्हें निर्वस्त्र एक ही बिस्तर पर सुलाया जाता—किसी अप्राकृतिक संबंध से सिद्धि पाने की भ्रांति थी। ऊँची-ऊँची समाधियाँ मिल जाने पर भी वे स्वतंत्र नहीं थे—आदेशों में बँधे साधक थे। ऊब-घुटन में उन्होंने सलाह की।
ठंड पड़ते ही भागना होगा,” भगवती बोली।
कैसे? किधर? चारों ओर हिंसक जानवर, घना जंगल,” देवाधिपति ने कहा।
मैं जंगल चीरकर बस्ती तक पहुँचा सकती हूँ। जंगली जानवरों को वश में कर सकती हूँ—वे भयानक नहीं रहेंगे। बस्ती पहुँचे तो हम स्वतंत्र होंगे; वहाँ पहुँचकर हम अपने-अपने रास्ते जाएंगे।
तो वहाँ पहुँचकर हम अलग हो जाएंगे?”
वहाँ पहुँचकर हम अपने-अपने मालिक होंगे। न भगवती, न देवाधिपति—मैं मैं रहूँगी; तुम तुम—पूरे-पूरे।

 

एक भोर भगवती और देवाधिपति आश्रम छोड़कर निकल पड़े। पता चलने पर महागुरु और शिष्य उन्हें रोकने आए।
भगवती मंत्रोच्चार-सा कुछ बुदबुदाती, घूमने लगी; देवाधिपति को भी घुमाया। दोनों घूमते रहे—और थोड़ी ही देर में उनके सिवा सब अचेत-बेहोश होकर गिर पड़े।
भगवती और देवाधिपति आश्रम छोड़कर चल पड़े। कई दिनों की यात्रा के बाद वे एक नई बस्ती पहुँचे।

५. नौलो वस्ती

 

अतृप्त जीभ की तरह मनुष्य पूर्ण तृप्ति की तलाश में
नए-नए रास्तों और नई बस्तियों में भटकता ही रहता है।

 

अब हम—हम नहीं। तुम बखते हो, मैं भगवती नहीं।
नई बस्ती पहुँचते ही भगवती ने कहा—अब हम अपने-अपने रास्ते चलें!

इतना कहकर भगवती बेतहाशा दौड़ पड़ी। बखते कुछ कह भी न सका। किंकर्तव्यविमूढ़ बखते! जब चेतना आई कि उसे दौड़कर भगवती से मिलना चाहिए, वह भी उसी दिशा में दौड़ा। बहुत देर दौड़ने पर भी वह नहीं मिली। हताश और निराश होकर वह ज़मीन पर धम्म से बैठ गया।

मनुष्य मनुष्य की सहायता, संगति, सहचर्य और सहयोग के बिना जीवित नहीं रह सकता। फिर से मनुष्यों के बीच पहुँच गया हूँ—यह सोचते ही भगवती से बिछोह की पीड़ा कुछ कम हो गई।

लुप्त हो चुकी भगवती—अब भगवती नहीं रही; उससे अब मिलना संभव नहीं। वह अकेली, स्वतंत्र जीवन जीना चाहती थी और उसे छोड़कर चली गई।
अपने-अपने रास्ते; अपने-अपने गंतव्य!

अकेला बखते चारों ओर देखने लगा। न पहाड़—बल्कि एक विशाल समतल मैदान। यही तराई-मधेस होगा। किससे पूछे? बहुत दूर एक बस्ती दिखी—घर, पेड़-पौधे, बड़े खेत में पीली सरसों खिली हुई। आह! कितना आकर्षक, मनोहारी! बखते को लगा जैसे उसे नया जीवन मिल गया हो।

थकान उतरने तक बैठकर वह बस्ती के एक बड़े घर तक पहुँचा। वहाँ बहुत-से लोग थे; कुछ के हाथों में हथियार भी थे।
नई बस्ती में नया लड़का।

तुम कौन हो?”—एक आदमी ने पिस्तौल तानकर पूछा। दूसरे लोग भी उसे घेरने लगे।
मैं बखते।
कहाँ से आए हो? सरकारी मुखबिर तो नहीं… सब लोग सतर्क रहो!

अफरातफरी मच गई। हथियारबंद लोग मोर्चा सँभालने लगे, दूसरे लोग इधर-उधर भागने लगे। एक ने कड़े स्वर में आदेश दिया—
सब लोग घर के भीतर शांत रहिए। हम जनसेना हैं—आपको कुछ नहीं होने देंगे।

तीन लोगों ने उसे पकड़कर कमरे में ले गए। पूछताछ शुरू हुई—
कौन हो? क्यों आए हो? नाम क्या है? कहाँ से आए हो?”
मैं बखते हूँ, जंगल से भागकर आया…
किसके साथ आए?”
भगवती के साथ।
भगवती कहाँ है? कौन है भगवती?”
भगवती उधर दौड़कर चली गईं, मुझे यहाँ छोड़कर। वह आश्रम में मेरी सहधर्मिणी थीं।
इसे ठीक से सच उगलवाने के लिए जमकर पीटो।
इतना कहते ही मार शुरू हो गई—और बखते बेहोश हो गया।

 

ए… ओए भांजे!
कौन? मैं?”
हाँ, तुम—मेरे भांजे।
कैसे भांजा?”
तुम जैसे सब लड़के मेरे भांजे और लड़कियाँ भांजियाँ।
आप कौन हैं?”
मैं मामा हूँ। तुम्हारी माँ मेरी बहन है—तो तुम मेरे भांजे। यहाँ कैसे आ पहुँचे? बहन ठीक है?”

माँ का नाम आते ही बखते का भीतर हिल गया। स्मृतियों का तूफ़ान उमड़ आया, गले में अटक गया—हिचकियाँ फूट पड़ीं। माँ-बाप और भाई-बहनों के परिवार की याद ने आँखें भर दीं—बाढ़ में बहती माँ की झलक, ऊपर उठे हुए, जैसे पुकारते हाथ!

मामा…—बखते की आवाज़ काँप गई।
कहो भांजे, बिना झिझक।
माँ तो बाढ़ में बहकर मर गईं। पिता, भाई-बहन और बारह-बीस सुकुम्बासी परिवार भी बाढ़ में बहकर मर गए। मैं उस समय वहाँ नहीं था—इसलिए उस बस्ती में मैं ही बचा…—हिचकियाँ लेते हुए वह रो पड़ा।
हाय! सब बह गए!—मामा ने आश्चर्य जताया।

आसपास खड़े लोगों से मामा बोले—ये मुखबिर नहीं हैं। दुखी लड़का है। सुनते ही लोग चले गए। वहाँ सिर्फ मामा और बखते रह गए।

 

तुम्हारी सारी बातें सुनकर लगता है—मैं भी तुम्हारी तरह ही दुखी परिवार में जन्मा-पालित हूँ। मैंने भी इस दुनिया में मनमाफ़िक साँस नहीं ली, मनचाहा जीवन नहीं जिया। मेरा बचपन दुख में बीता—वह लौट नहीं सकता। पर तुम्हारे बचपन को कुछ हद तक सुखद और उर्वर बनाने की कोशिश मैं करूँगा, भांजे।

आपने मुझे भांजा कहा—जब मुझे लग रहा था कि इस दुनिया में मेरा कोई नहीं…
तो मैं मामा हुआ न!—मामा खुलकर हँसे। बखते को भी हँसी गई।

निर्बंध हँसी के साथ अपनत्व की हवा दोनों के बीच बहने लगी। नया भांजा मामा से खुलने लगा—बिना झिझक अपनी बातें कहने लगा।
इस बस्ती के बारे में बताइए, मामा।
यह सुकुम्बासी नई बस्ती है। हम सब—कहीं से भी आए—सरकारी ज़मीन पर बसकर एक परिवार बन गए हैं। यहाँ कोई बड़ा-छोटा नहीं; सब समान हैं और साझा गंतव्य की ओर बढ़ने वाला एक परिवार हैं।

सब कुछ पूरी तरह समझ न पाने पर भी बखते रुचि से सुनता रहा। मामा ने उसे बस्ती घुमाई और सबसे मिलवाया। अंत में उसे पाठशाला ले जाकर कहा—
कल से तुम यहीं पढ़ोगे। पढ़ाई तुम्हें जीवन समझने और आगे बढ़ने में मदद करेगी। शिक्षा मनुष्य को सोचने का तरीका और वैज्ञानिक दृष्टि सिखाती है।

पाठशाला में मामा ने उसका नाम मापुरुष लिखवाया। यह पाठशाला सामान्य विद्यालय की तरह कक्षा-परीक्षा और प्रमाणपत्र बाँटने वाली नहीं थी; यह जीवनोपयोगी शिक्षा देती, हिसाब-किताब सिखाती और छोटे-छोटे कौशल सिखाती थी। इसे बस्ती के लोगों ने मिलकर खोला था। बखते—अब मापुरुष—वहाँ पढ़ने लगा।

पढ़ते-पढ़ते बारिश आई, थमी—एक साल बीत गया। इस दौरान कड़ी मेहनत से उसने पढ़ना-लिखना सीख लिया।

एक दिन मामा उसे फिर बड़े हॉल में ले गए। वहाँ लोग हथियार चलाने का प्रशिक्षण ले रहे थे।
एक प्रशिक्षक कह रहा था—
साथियो! जो लड़ नहीं सकता, वह दास बनता है। अपनी रक्षा के लिए हर तरह से सक्षम और शक्तिशाली होना ज़रूरी है। ज़रूरत पड़े तो विद्रोह भी करना पड़ता है। हथियार चलाना आना चाहिए—हम गोपनीय रूप से इसका प्रशिक्षण ले रहे हैं। पूरा ध्यान दें।

सबने तालियाँ बजाईं।
मामा बोले—तुम अभी छोटे हो—बड़ी बंदूक उठाना मुश्किल है। पिस्तौल चलाना सीखो; बंदूक दूसरों को चलाते ध्यान से देखो।
और मामा ने स्वयं उसे पिस्तौल चलाना सिखाया।

प्रशिक्षण के समापन समारोह में कुछ वक्ताओं के विचार संक्षेप में इस प्रकार थे—

सामदेव:
मनुष्य बनने और स्वयं का स्वामी बनने के लिए शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य आवश्यक है। शरीर से तंदुरुस्ती दिख जाती है, पर मन—यानी सोच—तुरंत नहीं दिखती। सही सोच मनुष्य को सही रास्ते पर चलाती है। सोच न होने पर मनुष्य दूसरों का दास बनता है। क्या करना है—यह न सोच पाने से लोग दूसरों के आदेश में जीते हैं। जब सोच नहीं होती, अपनी शक्ति का ज्ञान भी नहीं होता; तब दासता से मुक्त होने का विचार भी नहीं आता। शिक्षा और प्रशिक्षण ही योग्यता व क्षमता देते हैं—इसीलिए वे महत्वपूर्ण हैं। सोच से गंतव्य बनता है; गंतव्य से क्रियाशीलता।

बलबहादुर:
सोच केवल अपने लिए नहीं, समाज और देश के लिए भी होती है। समूची मानवता को उन्नति की राह पर ले जाने वाली सोच न बन पाने से अनेक युद्ध हुए। युद्ध से उबरने और विश्व शांति के लिए उलटी सोच पर आधारित उलटी यात्रा को सीधी दिशा में मोड़ना होगा।

बुद्धिकर्ण:
तथाकथित मानव सभ्यता कुछ मुट्ठीभर चतुरों की रची हुई सोच, दर्शन और संरचनाओं में बहुसंख्यक आम लोगों को भ्रम-जाल में फँसाती रही है। सकारात्मक सोच के अभाव में वे दीपक पर पतंगे-से झुलसते रहते हैं; ऐसे हालात रहे तो सामान्य जन सदा दास बनकर, मकड़ी के जाले में फँसे कीड़े-सा जीवन ही जीते रहेंगे।

हरिदत्त:
जब मन और तन आम लोगों के अपने अधीन नहीं होते, वे अपने हित की सोच और कर्म नहीं कर पाते। ‘हम दास बनने के लिए पैदा हुए’—इस सोच ने उन्हें उनके ही मन-तन का मालिक नहीं बनने दिया। जबकि मेहनतकश लोग ही धरती के वास्तविक मालिक हैं।

 

 

सोच क्या है?
वह रास्ता है। वह रोशनी है। वह लक्ष्य है। वह सक्रियता है। वह शक्ति है। उद्देश्य की प्राप्ति है। अपनी मुक्ति भी है।
सोच ही जीवन है। सोच जीवन की प्राणवायु की भी प्राणवायु है।

मापुरुष ने सोच के बारे में उतना ही सोचा, जितना एक बच्चे का दिमाग सोच सकता था। उसने सोच को थोड़ा-बहुत समझा।
रास्ता न हो तो आगे कैसे बढ़ा जा सकता है? रोशनी में ही तो संसार दिखाई देता है। लक्ष्य, सक्रियता, शक्ति और आत्म-अस्तित्व सोच ही देती है।
सोच न हो तो मनुष्य, मनुष्य नहीं रहता; वह दूसरों का दास बन जाता है। इसलिए मनुष्य बनने के लिए अपने भीतर सोच होना आवश्यक है।
सोचना शुरू करें और सोचने की क्षमता का विकास करके इंसान स्वयं अपना मालिक बन सकता है।

कहीं-कहीं मापुरुष को सोच के बारे में एक धुंधली-सी समझ बनने लगी थी। चूँकि सोच ज्ञान पर आधारित होती है, इसलिए उसने ज्ञान बढ़ाने वाली पुस्तकों को रुचि से पढ़ना शुरू किया। पढ़ने के साथ-साथ उसने कुछ लिखना भी शुरू कर दिया।

एक दिन मामा और उनके साथियों ने उस बस्ती के छोटे-छोटे बच्चों को, मापुरुष सहित, जंगल में ले जाकर कहा—
हमें सूचना मिली है कि पुलिस नई बस्ती में कार्रवाई शुरू करने वाली है, इसलिए हम सब इस जंगल के सुरक्षित स्थान पर आए हैं। घबराना मत।

नई बस्ती की पकी फसल को लूटने के लिए सामंतों ने पुलिस और सेना को बुलाया था। दोतरफ़ा मुठभेड़ कराकर मामा और उनके साथियों को मुठभेड़ में मरवाने की योजना का पता चलने पर वे भागकर जंगल आ गए थे।

बखते फिर से जंगल के भीतर आ पहुँचा। पहली बार जंगल में वह देवाधिपति बना था, दूसरी बार वह मापुरुष बना। वहाँ लगभग सौ के आसपास बड़े लोग थे। उन्होंने जंगल के भीतर ही एक शिविर खड़ा किया था। भोजन-रसद, विस्फोटक और गोलाबारूद—सबकी व्यवस्था थी।
बच्चों को भी दुश्मन की जासूसी से कैसे बचना है और दुश्मन से सुरक्षा कैसे करनी है, इसकी जानकारी और प्रशिक्षण दिया गया।

नई बस्ती के धान, मक्का, अनाज, पशुधन और कीमती सामान नकली लाल-पुर्ज़े बनवाने वाले सामंत ले गए। विरोध करने वाली दो महिलाओं को घसीटते हुए पुलिस और सेना के हवाले कर दिया गया। पुलिस और सेना के जवानों ने तरह-तरह की यातनाएँ देकर उन दोनों महिलाओं को गोली मार दी।

यह सुनकर मामा और भूमिगत विद्रोहियों का खून खौल उठा। रात के समय हमला करके उन्होंने सामंतों और उनसे भिड़ने आए पुलिसकर्मियों को मार डाला। सामंती सफ़ाया अभियान चलाने का निर्णय लिया गया।
लेकिन उनके अपने जीवन भी खतरे में पड़ गए थे, इसलिए चारों ओर भूमिगत होकर बिखर जाने का फैसला किया गया।

मापुरुष और छोटे भांजे-भांजियो! हम तुम्हें अपने साथ नहीं ले जा सकते। हमारी जान खतरे में है, और तुम्हारी जान को भी खतरे में नहीं डाल सकते। तुम लोग थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीख चुके हो। कहीं भी जाकर अपना भविष्य सुखद बनाओ।
जीने के लिए साहस के साथ संघर्ष के मैदान में उतर जाओ!
प्यारे भांजे-भांजियो—विदा!

इतना कहकर मामा और उनके साथी अलग-अलग दिशाओं में चले गए। अभिभावक-विहीन होकर वहीं छूटे बच्चों की आँखें आँसुओं से भर आईं।

 

अध्याय — दूसरा

पौधा घना होता हुआ

 

1. शहरी चकाचौंध

सांसारिक जीवन की सुंदरता
सक्रियता, सेवा, संयम और धैर्य

इतने अधिक लोग! तरह-तरह के लोग सड़कों पर बहते जा रहे हैं। किसी को किसी की परवाह नहीं। सब अपनी-अपनी धुन में न जाने कहाँ जा रहे हैं। आना-जाना लगा हुआ है। शहर तो मानो इंसानों का समुद्र ही है।

बखते ने चारों ओर देखा और सोचा— यहाँ कोई जाना-पहचाना नहीं। कभी न देखा हुआ शहर। अपने परिवार को बहा ले जाने वाली नदी से भागते-भागते वह यहाँ आ पहुँचा था। वह अभी भी मौत से भाग रहा था।
चलते रहना ही जीना है। जीना ही सबसे बड़ा सच है— इसी सोच ने उसे चलते रहने को मजबूर किया और वह चलता ही रहा।

चार-पाँच उसकी ही उम्र के लड़के-लड़कियों ने उसे घेर लिया और बोले—
तुम भी हमारे जैसे ही लगते हो। सौतेली माँ या सौतेले पिता की मार-पीट से भागे हो क्या? इस शहर में तुम्हारा कौन है?”

बखते ने सिर हिलाकर इशारा किया कि कोई नहीं है।

तो तुम्हारा भी हमारे जैसा ही कोई नहीं रहा। हमारे साथ ही रहो। एक लड़की ने कहा।

बखते को भी कोई आपत्ति नहीं थी, पर वह चुप रहा। वह भिखारी बच्चों का झुंड चल पड़ा था। वही लड़की उसे खींचकर साथ ले गई।
अकेले से बेहतर साथ यही सोचकर वह उनके साथ चला गया।

भिखारी बच्चे! दिन भर इधर-उधर भटकते। कहीं फेंका हुआ खाना मिला तो खा लिया। बिकने लायक चीज़ें मिलीं तो इकट्ठा कर लीं। बेचकर मिले पैसों से कुछ खा लिया।
रहने के लिए— शहर के खाली मैदान, जर्जर घर, पाटी-पौवा और फुटपाथ; ओढ़ने के लिए— पूरा आकाश।
उनके साथ रहते हुए उसने शहर घूमा और शहर को पहचाना।

दिन-रात बीतते गए। उन्हीं दिनों पहली बार उससे बात करने वाली लड़की— जुनेली— उससे और भी घुलने-मिलने लगी।
उस झुंड का उससे थोड़ा बड़ा लड़का, गुमाने, को यह पसंद नहीं था। वह बखते को मारकर उस झुंड से निकाल देना चाहता था।
उसने बखते पर हमला किया, लेकिन बखते ने नई बस्ती में सीखी आत्मरक्षा की तकनीक का प्रयोग कर उसे हरा दिया।

जीवन एक युद्ध है— विजेता बखते जुनेली की नजरों में और ऊँचा उठ गया।

इस तरह भटकते भिखारी जीवन में कुछ नहीं बन पाओगे। मैं एक होटल जानती हूँ। वहाँ काम करने पर खाना भी मिलेगा और तनख़्वाह भी। हम दोनों वहाँ काम करें।
जुनेली का यह प्रस्ताव बखते ने मान लिया।

होटल में नया काम— गिलास, बर्तन धोना, मेज़ पोंछना आदि। नए-नए लोगों से मुलाकात होती। कोई-कभी थोड़ी-बहुत टिप भी दे देता।
वहाँ एक मास्टर साहब अक्सर चाय पीने आते थे। एक दिन उन्होंने घर के कामकाज के लिए उसे अपने साथ ले जाने की बात रखी।
बखते ने कहा— जुनेली से सलाह करके बताऊँगा।

यह सुनकर जुनेली स्तब्ध रह गई, फिर बोली—
जाओ, लेकिन कभी-कभी मुझसे मिलने आते रहना।
दूसरी ओर मुँह फेरकर उसने आँसू पोंछे।

पहली तनख़्वाह मिलने के बाद मिठाई का पैकेट और कुछ पैसे जुनेली को देने बखते होटल गया— लेकिन जुनेली वहाँ नहीं थी।

उसने मालिक से पूछा।
भाग गई। कोई भिखारी लड़का आया था, उसी के साथ गई होगी।

बखते को लगा— वह गुमाने ही रहा होगा।
वह दिन भर, शाम तक, भिखारियों के रहने की जगहों पर खोजता रहा— न जुनेली मिली, न गुमाने।
जुनेली न मिलने पर मिठाई का पैकेट उसने दूसरे भिखारी बच्चों में बाँट दिया।

जुनेली!… जुनेली को याद कर उसकी आँखों से दो बूँद आँसू टपक पड़े।

माँ-बाप, भाई-बहन, बड़ी दीदी, भगवती, मामा और जुनेली—
सब मेरे जीवन से खो गए। दूर हो गए। क्या कभी फिर मिलेंगे?

बखते ने सोचा— जब तक जिंदा हूँ, किस्मत बचाए हुए है, तो कभी न कभी मुलाकात होगी।
लेकिन उनके बिछड़ने का दर्द आँसुओं से भी नहीं बह सका। जीवन कभी पीड़ा-रहित नहीं होता।
मैं कुछ और चाहता हूँ, और कुल्हाड़ी कहीं और वार करती है।

पुराने छूटे, नए लोग उसके जीवन में जुड़े। रोते मन को समझाने के लिए उसने मास्टर के साथ रहकर खूब पढ़ने-लिखने का निश्चय किया।
माँ की इच्छा के अनुसार समझदार बनकर बड़ा आदमी बनने का संकल्प लेकर वह मास्टर के साथ रहने लगा।

मास्टर के यहाँ उनके मित्र भी आते-जाते रहते थे। वहाँ राजनीति और सामाजिक विकास के सिद्धांतों पर चर्चाएँ होतीं।
अलमारी भर किताबें थीं। उनकी बातें सुनकर बखते किताबों की ओर आकर्षित हुआ। फुर्सत में उसने कई पुस्तकें पढ़ीं।
किताबों ने उसके ज्ञान को निखारा और नई सोच दी। सोच मन को संभालती है, काम में एकाग्रता और सक्रियता बढ़ाती है, उत्साह जगाती है।

वह मानसिक रूप से परिपक्व होने लगा।

जीने के लिए उसे बड़ी दीदी, भगवती, मामा और जुनेली का सहारा मिला था।
जब जुनेली की याद उसे सताती, वह होटल जाकर उसे खोजता।
इंसानों का समुद्र— और हर इंसान उसमें एक-एक बूँद। साथ-साथ बहती बूँदें समय के साथ कहाँ-कहाँ पहुँच जाती हैं…

जुनेली भी कहाँ पहुँची होगी? कहीं न कहीं मिल ही जाएगी— यही आशा उसे बार-बार होटल ले जाती।
जब जुनेली नहीं मिली, तब उसे समझ आया— जीवन कितना पीड़ादायक हो सकता है!
यह उसके मन का बोझ था— मन का बोझ किसी से मत कहो।

एक दिन मास्टर साहब ने मज़ाक में, लेकिन गंभीर होकर कहा—
तुम्हारा नाम ‘बखते’ अब ज़माने के अनुरूप नहीं है। इस आधुनिक समय में यह नाम तुम्हें आगे बढ़ने में मदद नहीं करेगा। क्यों न तुम्हारा नाम ‘बिख्यातमान’ रख दिया जाए?”

जैसी आपकी इच्छा। बखते चकित रह गया।
जैसे साँप केंचुल बदलता है, वैसे ही उसके जीवन ने नया रूप लिया— और नाम भी बदल गया।

बिख्यातमान!

मान तो उसे पहले कभी नहीं मिला था, पर नाम में ही मान जुड़ गया। उसने गुरु की बात मान ली।

अब उसे साल, तारीख़ और दिन का ज्ञान होने लगा। शिक्षा के प्रकाश से आलोकित होकर वह सच में इंसान बनने लगा।
गुरु के साथ रहते हुए एक वर्ष बीत चुका था।

एक दिन गुरु ने कहा—
बिख्यातमान, मुझे कुछ समय के लिए गाँव जाना है।

कब लौटेंगे, सर?”

मुझे ‘सर’ मत कहो। नाम से बुलाओ। मेरा नाम जानते हो?”

जानता हूँ, सर।

फिर सर? मेरा नाम क्या है?”

सुवर्ण।

हाँ, मुझे सुवर्णजी कहो।

आप सर ही रहेंगे। जब आपके जितना बड़ा आदमी बनूँगा, तब सुवर्णजी कहूँगा।

अभी ही सुवर्णजी कह दो!
गुरु ज़ोर से हँसे— हा हा हा!

बिख्यातमान भी हँसे बिना न रह सका। दोनों एक साथ हँस पड़े।
हँसने के लिए भी साथी चाहिए— हँसी अपनापन और निकटता पैदा करती है।

सुवर्ण ने कहा—
मेरे माता-पिता बहुत बूढ़े हो चुके हैं। बहन की शादी हो चुकी है। उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं। मुझे शादी करनी होगी। मैं गाँव जाकर विवाह कर रहा हूँ। जब तक मैं लौट न आऊँ, तुम स्कूल के हॉस्टल में रसोई का काम करते रहना। लौटने पर फिर साथ रहेंगे।

कब लौटेंगे?”

परसों जाऊँगा, एक महीने में लौट आऊँगा।

सुवर्ण गाँव चले गए। महीने बीत गए, साल बीत गए— लेकिन वे लौटकर नहीं आए।
तब न टेलीफोन था, न मोबाइल। केवल चिट्ठी-पत्र का सहारा था, और पता भी मालूम नहीं था।

इस बीच बखते किशोरावस्था में कदम रख चुका था और बिख्यातमान बन गया था।
रसोई में उसकी अच्छी पकड़ हो गई थी, प्रिंसिपल की नज़र उस पर पड़ी।
उसे आठवीं कक्षा में पढ़ने की सुविधा दी गई। काम करते-करते उसने एस.एल.सी. पास कर ली।

अब बिख्यातमान छोटी कक्षाओं को पढ़ाने वाला युवा मास्टर बन गया। पढ़ाते-पढ़ाते उसने एम.ए. पास कर लिया।
अब वह एक सुंदर, जवान युवक बन चुका था। सुंदर युवतियाँ उसकी ओर आकर्षित होने लगी थीं।

उनमें से एक— रूपसी— उस पर बहुत मोहित थी। बहाने बनाकर मिलने आती।
एक दिन उसने कह ही दिया— बिख्यात, आई लव यू।

क्या कहा?”

समझे नहीं? मैं तुमसे प्रेम करती हूँ…

बिख्यात का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। ऐसा प्रेम उसने कभी नहीं सुना था।

दोनों के बीच प्रेम बढ़ता गया।
लेकिन बिख्यात के पास न धन था, न परिवार।
दुखी होकर उसने कहा—
रूपसी, मेरे पास न पैसा है, न घर-परिवार। मैं अनाथ हूँ। मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ, लेकिन तुम्हें सुख नहीं दे सकता। तुम किसी और से विवाह कर लो।

बिख्यात, कितने निर्दयी हो तुम!
रूपसी रो पड़ी—
क्या विवाह ज़रूरी है? यदि करूँगी तो तुमसे ही, नहीं तो जीवन भर अविवाहित रहूँगी।

इतना कहकर वह रोती हुई वहाँ से भाग गई।

उसके जाने के बाद बिख्यात को समझ आया— रूपसी उसके जीवन में क्या थी।
उसके बिना जीवन एक गहरा शून्य था।

उसने रूपसी से मिलकर कहा—
मुझे माफ़ कर दो। मैं तुमसे अत्यंत प्रेम करता हूँ। तुम्हें सुखी देखना चाहता हूँ। मैं अनाथ हूँ, इसलिए तुम्हें दुख न मिले— यही सोचकर मैंने ऐसा कहा।

रूपसी ने कहा—
यदि तुम विवाह के लिए तैयार हो, तो मैं अपने माता-पिता से बात करूँगी। मुझे धन-संपत्ति नहीं चाहिए— बस तुम चाहिए।

कुछ दिन और सोच लो। तुम्हारा निर्णय मुझे स्वीकार होगा।

और अंततः—
बिख्यातमान और रूपसी विवाह-सूत्र में बँध गए।

 

२. दाम्पत्य सुख

 

चाहे रात कितनी ही लंबी क्यों न हो, सुबह अवश्य होती है।
इंतज़ार करना आना चाहिए—दुख और सुख का क्रम चलता ही रहता है।

बिख्यातमान ने सपने में भी नहीं सोचा था कि इतनी सुंदर, सुसंस्कृत और शहरी शिक्षा प्राप्त नारी उसकी जीवन-संगिनी बनेगी। पर ऐसा हुआ। उसे जीवन में अतुलनीय, अपार सुख और आनंद मिला। उसे लगने लगा कि उसका जीवन सार्थक हो गया है।
अपने भीतर छिपे साहस और शक्ति के प्रखर होकर उभर आने का अनुभव होते ही उसका मन प्रसन्नता से भर उठा। सच ही कहा गया है—मन प्रसन्न हो तो कंकड़ों में भी गंगा दिखती है। उसने अपनी सारी ऊर्जा दाम्पत्य सुख के लिए भरपूर लगा दी।

वे दोनों एक पूर्ण जोड़ी बनकर दाम्पत्य संसार रचने लगे। एक की मुस्कान दूसरे की प्रेरणा, संजीवनी और दुख-पीड़ा की औषधि बन जाती। एक-दूसरे को पा लेने पर उन्हें लगता कि सब कुछ मिल गया।
उन्होंने एक बोर्डिंग स्कूल खोला। स्कूल अच्छी तरह चल पड़ा। धन आया तो वे विभिन्न संघ-संस्थाओं में भी सक्रिय होने लगे। मोहल्ले में लोकप्रिय हो गए। वे दाम्पत्य प्रेम में पूरी तरह डूबे रहते और सोचते—जीवन में प्रेम मिल जाए तो और क्या चाहिए!

एक पुत्र और एक पुत्री के जन्म के बाद परिवार सुखी और पूर्ण हो गया। स्कूल की इमारत बन जाने के बाद उन्होंने अपना निजी भवन भी बनाया। अब वे संपन्न परिवारों में गिने जाने लगे।
किस बात की कमी थी? नाम, धन, काम—सब कुछ, और ऊपर से भरपूर प्रेम और स्नेह! जितना चाहा, उतना मिलता रहा।

यदि उनमें से कोई गंभीर दिखता, तो दूसरा तुरंत पूछ लेता—क्या हुआ?”
कुछ नहीं,” कह भी न पाता कि मन खिल उठता। मुझसे प्रेम करने वाला, मेरे लिए सब कुछ न्योछावर करने वाला कोई है—यह सोचते ही मन और तन में एक साथ आनंद का संचार हो जाता।
दिन भर दोनों ध्यान लगाकर काम करते। शाम को राजनीति, समाज और किसी भी विषय पर बातचीत होती। जैसे रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा है—सुखी होना है तो अनेक विषयों में रुचि रखनी चाहिए। वैसे ही वे कई विषयों में रुचि लेकर उन पर चर्चा करते रहते। एक-दूसरे के प्रति प्रेम और विश्वास से दाम्पत्य सुख निरंतर चलता रहता।

फुटबॉल जगत में पेले को फुटबॉल सम्राट क्यों कहा जाता है?”
क्योंकि पेले ऐसे खिलाड़ी थे जो आँखों की भौंह जैसी टेढ़ी मुद्रा से भी गोल कर सकते थे।
दोनों खूब हँसे।
तुम हर बात की तुलना मुझसे करते हो।
तुम्हारे अलावा मैंने क्या देखा, क्या जाना है… बस तुम ही।
होगा, पुरुषों की मीठी बातें।
मीठी नहीं—तुम हँस दो तो मैं इंद्र का आसन भी हिला दूँ।

मनोरंजक बातचीत से हृदयों में बसावट होती है और दो दिल एक हो जाते हैं।
दाँत-विहीन बुढ़िया।
कौन?”
तुम! 85 साल की, दाँत न रहने पर भी तुम्हें दाँत-विहीन बुढ़िया कहकर बुलाने की कल्पना कर सकता हूँ न?”
झुर्रीदार बूढ़े! रूपसी खिलखिलाकर हँसी—कह सकते हो। मैं भी तुम्हारे झुर्रियों से भरे चेहरे को देखकर झुर्रीदार बूढ़ा कह सकूँ।
85
वर्ष की दाँत-विहीन बुढ़िया और 89 वर्ष के झुर्रीदार बूढ़े की कल्पना कर दोनों आनंदित हो उठे। उस उम्र में पोते-पोतियों से घिरे होने की कल्पना से रूपसी और बिख्यातमान अत्यंत रोमांचित हो गए।

 

३. चुनाव

नाटक-मंचन में हम सब दर्शक पात्र हैं—
कभी खेलते हैं, कभी केवल देखते रह जाते हैं।

हवा, पानी और अन्न की तरह जीवन की सरलता या सहजता को सूक्ष्म और व्यापक रूप से प्रभावित करने वाला तत्व राजनीति है। जीवन के हर पक्ष पर इसका प्रभाव पड़ता है। राजनीति से अनभिज्ञ रहने की बात नहीं कही जा सकती। समाज में रहते हुए, यदि राजनीति में भाग नहीं लिया जाए तो, प्लेटो के शब्दों में, “अपने से कम योग्य लोगों द्वारा शासित होना पड़ता है। आज भी यह लागू होता है।

चुनाव में, समाज में स्वच्छ छवि वाले प्रभावशाली उम्मीदवारों की तलाश में एक बड़े दल की नज़र बिख्यातमान पर पड़ी। उसे उम्मीदवार बनने का आग्रह किया गया।
रूप्से!
कहिए, बिख्खे।
मेरा नाम बिगाड़ती हो! बिख्यातमान ने रूठने का अभिनय किया।
मेरा नाम बिगाड़ते हो! रूपसी ने भी चिढ़ने का अभिनय किया।

तो फिर नाराज़ मत होना, मेरी प्यारी रानी।
मेरे प्यारे राजा! कहिए। — दोनों ठहाकर हँस पड़े।

संसद के चुनाव में मुझे उम्मीदवार बनने के लिए एक बड़ी पार्टी कह रही है। क्या करूँ, रानी?

चुनाव, राजनीति… तुम क्या सोच रहे हो, राजा?

मेरे सोचने का दिमाग तुम हो। मैं अकेले सोचकर कुछ नहीं कर सकता। मेरी ज़िंदगी में तुम्हारा पूरा अधिकार है। तुम्हारी इच्छा के बिना, तुम्हें मंज़ूर न हो, ऐसा कोई काम मैं नहीं कर सकता।

मैं अभी तुरंत कुछ नहीं कह सकती। कहते हैं राजनीति गंदा खेल है। कहीं तुम्हें गिराने के लिए ही तो आगे नहीं बढ़ा रहे? माँ-बाप, बड़े भाई और मोहल्ले के प्रमुख लोगों से भी सलाह करनी होगी। उसके बाद निर्णय करेंगे। ठीक है?

ठीक है, महारानी।

अच्छा, मेरे महाराजा! — हँसी-मज़ाक में ही बात समाप्त हो गई। दोनों प्रसन्नता के साथ शयनकक्ष की ओर चले गए।

 

 

बिख्यातमान ने चुनाव जीत लिया, सांसद बन गया। वह प्रसिद्ध हो गया। उसने प्रगति की चरम चोटी को छूना शुरू कर दिया। अपने ही दम पर जीने वाला वह अब जनता का आदमी बन गया। जनता के भाग्य का विधाता—सांसद। अब वह क्या कहेगा? लोगों के कान सतर्क हो गए। अब वह क्या करेगा? लोग हर बात पर ध्यान देने लगे।

राजनीति का चमत्कार! फुटपाथ के आदमी को शिखर पर पहुँचा देता है। शिखर पर पहुँचाकर शासक बना देता है। जनता और देश के भाग्य का फैसला करने वाला अधिकारी बना देता है।

बड़ी पार्टी को संसद में बहुमत मिला, इसलिए सरकार बनी। केवल पुराने लोगों को ही मंत्री बनाने से जनता में मंत्रिमंडल के प्रति वितृष्णा पैदा हो सकती थी, इसीलिए कुछ नए लोगों को भी मंत्री बनाया गया। नए मंत्रियों में बिख्यातमान भी शामिल था। ‘तालू में आलू उगना’—उसकी तरक्की दोगुनी रफ्तार से होने लगी।

मंत्री बनने के बाद वह बॉडीगार्डों, चाटुकारों और कार्यकर्ताओं से घिर गया। वह बन गया जनता का आदमी, देश का मंत्री और काम का आदमी! झंडा फरफराता हुआ, गाड़ी सर्र से चलती…

अब रूपसी से भी रात के देर समय में ही मुलाक़ात होने लगी। दिन भर काम, पार्टी की बैठकें, कार्यकर्ताओं और दूसरों से मुलाक़ातें, विचार-विमर्श, दावतें आदि। देर रात तक प्रतीक्षा करती रूपसी से उसने कहा—
मंत्रीनी रूप्से।

जी हाँ, मंत्री बिख्खे।

अब लोगों के सामने मुझे बिख्खे नहीं कह सकती।

हम दोनों ही तो हैं।

दीवारों के भी कान होते हैं।

अरे, मंत्रीजी! अब दीवारों से भी डरने लगे!

दोनों ज़ोर से हँस पड़े। उस मासूम हँसी से दिन भर की थकान पल भर में मिट गई।

 

खूँखार आतंकवादी गिरफ्तार’इस शीर्षक की खबर से राष्ट्रीय और स्थानीय अख़बार भरे पड़े थे।
बिख्यातमान ने भी अख़बार देखा। आतंकवादी की तस्वीर मामा की ही थी। खबर पढ़ी—नाम था सूरजप्रकाश। ध्यान से तस्वीर देखी—वह मामा ही था। उसने पी.ए. से पता लगाने को कहा—कहाँ और कब गिरफ़्तारी हुई, कहाँ रखा गया है? असली नाम क्या है?

नवीन बस्ती में गिरफ़्तारी हुई थी। पुलिस और विद्रोहियों के बीच दोहरी मुठभेड़ में ‘मामा’ कहे जाने वाले सूरजप्रकाश के पकड़े जाने की जानकारी मिलते ही मंत्री बिख्यातमान मामा से मिलने गए।

मंत्री बिख्यातमान मिलने आए हैं।
कौन मंत्री-शंत्री! मैं नहीं जानता, न ही मिलना चाहता हूँ।
चुपचाप चलो। मंत्री के सामने बदतमीज़ी करोगे तो अंजाम बहुत बुरा होगा।

तीन-चार पुलिसवालों ने धक्कामुक्की करते हुए उसे जेलर के कार्यालय तक पहुँचा दिया। बिख्यातमान ने ध्यान से देखा—वह मामा ही था।

मामा, नमस्कार।
सूरजप्रकाश उर्फ मामा ने भी मंत्री को देखा—मापुरुष।

मापुरुष, तुम?!”
किसका मापुरुष? नमस्कार करो, बदतमीज़! जेलर चिल्लाया।

अरे मंत्रीजी… मामा ने धीरे से, आश्चर्य मिश्रित स्वर में कहा।

मामा, मैं ही मापुरुष हूँ। वहाँ से निकलकर राजधानी आ गया। कई यात्राओं के बाद आज बिख्यातमान मंत्री बना हूँ। मैं आपके केस फ़ाइल का अध्ययन करके माफ़ी दिलाने की कोशिश करूँगा। ये मेरे मामा हैं। जेलर साहब, इन्हें जेल में ज़्यादा असुविधा न हो।

आतंकवादी सूरजप्रकाश—मंत्री का मामा!
बड़ी पार्टी और समर्थक अख़बारों व पत्रकारों ने तुरंत सुर बदल लिया—
बेचारे सूरजप्रकाश निर्दोष निकले। भीड़भाड़ में ग़लती से पकड़े गए थे।

कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के बाद कुछ समय में मामा रिहा हो गए। मामा बिख्यातमान के ही घर में रहने लगे।

बिख्खे प्यारे…
कहो, रूप्से रानी।

अख़बार देखा? कुछ अख़बार मामा का नाम सूरजप्रकाश आतंकवादी बताकर तुम्हें बदनाम कर रहे हैं।

करने दो। मैं डरता नहीं। ज़्यादा से ज़्यादा यही मंत्री पद चला जाएगा। इन्हीं मामा ने अनाथ और असहाय मुझमें प्राण फूँके थे। जीना सिखाया था। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उन्हीं की वजह से हूँ। उनका ऋण चुकाने का एक अवसर मिला, बस वही किया।

अगर इस बात से तुम खुश हो, तो मैं भी खुश हूँ।
धन्यवाद, प्रिये। तुम्हारी खुशी में ही मेरी खुशी छिपी है।

पार्टी के भीतर मामा के विषय को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर बिख्यातमान को बदनाम करके हटाने और अपने गुट का मंत्री बनाने की साज़िशें चलने लगी थीं। उधर बिख्यातमान भी मामा के अच्छे गुणों की चर्चा करते हुए उन्हें पार्टी में प्रवेश दिलाकर सक्रिय कर रहे थे।
गुट–उपगुट केंद्र से लेकर वार्ड तक फैल चुके थे, फिर भी पार्टी टूटी नहीं थी।

 

अगले चुनाव में पार्टी ने टिकट देने की बात की, फिर भी बिख्यातमान चुनाव में नहीं उतरा। उसे मौजूदा राजनीति ढीली की हुई झूले जैसी लगीकभी भी अचानक झटका देकर झूला झूलने वाले गिर सकते हैं। राजनीति की चाबी सच्चे राजनीति करने वालों के हाथ में नहीं रही थी। नेता कहाँ निर्णायक स्थिति में थे! फिर मन की ये बातें किसी से कहने का क्या अर्थ? उसने अपनी पत्नी रूपसी से ही कहा

एक बार मंत्री तो बन ही गया। राजनीति का सार भी समझ में गया। मंत्री होकर भी मनचाहा कुछ कर पाना संभव नहीं रहता। प्रशासनिक तंत्र का जाल, विदेशी आकाओं की ज़ंजीरों से बँधी राजनीति। संप्रभुता भी दूसरों के इशारों पर। भ्रष्टाचार के कीचड़ में डूबी हुईमैं राजनीति का नया, सीधा रास्ता खोजा जा सकता है या नहींइसी प्रयास में लगने का सोच रहा हूँ, मेरी प्रिय रानी।

मैं सहमत हूँ। क्षणभंगुर जीवन में ऐसे दाग लगें जो कभी धुल सकेंयही बेहतर है। आखिर साथ ले जाने को कुछ भी तो नहीं है।

कितनी उत्कृष्ट सोच, वाह-वाह!” सचमुच, बिख्यातमान ने ताली बजाई। रूपसी ने भी ताली बजाकर उसका साथ दिया। पतिपत्नी एक-दूसरे को जो साथ देते हैं, उसमें अपार सुख होता है। दोनों अत्यंत हर्षित हो गए।

 

 

४. कोरोना कोविड–19

 

रानी बनाते समय कानी—
यही है दो दिन की ज़िंदगी की कहानी।

 

कोरोना (कोविड–19) ने छुआ तो मौत—हवा से ही फैलने वाला। सोशल मीडिया, रेडियो, टीवी, मोबाइल, मैसेंजर—हर तरफ़ कोरोना का आतंक और उससे बचने के उपायों के संदेश ही संदेश। सब मर जाएँगे—मानव जाति ही समाप्त हो जाएगी—ऐसा डर। एक भयावह, जानलेवा वायरस का विश्वव्यापी हमला। दुनिया भर में लाखों लोग मर चुके थे और मर रहे थे।

कोरोना काल में लिखी गई निम्न लघुकथा उस समय की सिहरन पैदा कर देने वाली स्थिति को दर्शाती है।

 

(लघुकथा)

कैसा संदेश?

लॉकडाउन का 52वाँ दिन। आज भी ज़िंदा हूँ—यह सोचकर उठता हूँ। लॉकडाउन ने आदतें बदल दी हैं। समय काटने, ख़बरें जानने और मनोरंजन का साधन—मोबाइल। हाथ अपने आप मोबाइल की ओर बढ़ जाता है।

मैसेंजर पर—
(
कल क्या होगा, कहा नहीं जा सकता…)
वह एक दिन…
अचानक बुख़ार आता है! गला दुखने लगता है! साँस लेने में दिक्कत! सूँघने और स्वाद की शक्ति चली जाती है! सुस्ती! सिरदर्द! मतली…!!

कोरोना–कोविड 19 (एचकेएचएल—एचकेआईएस 19) की जाँच होती है।
तीन दिन तक लगातार तनाव में रहने के बाद, जब रिपोर्ट पॉज़िटिव आती है…

फिर एम्बुलेंस घर पहुँचती है…
और…
पड़ोसी खिड़कियों से तुम्हें देखते रहते हैं।
किसी के मन में सहानुभूति होती है,
तो कुछ मन तुम्हें देखकर हँस भी रहे होते हैं।

एम्बुलेंस के साथ आए स्वास्थ्यकर्मी तुम्हें रोज़मर्रा के उपयोग की चीज़ें और कपड़े रखने को कहते हैं और…
बेचारे तुम…
घरवाले तुम्हें एकटक देखते रहते हैं।
तुम्हारी आँखों से आँसू बोलने लगते हैं…

उसी पल…
जल्दी कीजिए,” आवाज़ आती है।
एम्बुलेंस का दरवाज़ा बंद होता है… सायरन बजने लगता है…
और वह मोहल्ला सील कर दिया जाता है।
और 14 दिन तक बिल्कुल अकेले रहने को कहा जाता है।

दो वक़्त का खाना मिल भी जाए,
पर टीवी, मोबाइल—सब अदृश्य हो जाते हैं।
बंद कमरे की दीवारों पर अतीत और भविष्य के दृश्य उभरने लगते हैं…

यदि तुम ठीक हो गए तो… ठीक।
वह भी तब, जब तीन टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आएँ।
और घर वापसी…

पर
यदि इलाज के दौरान कोई अनहोनी हो गई!
तो तुम्हारे शरीर को प्लास्टिक में लपेटकर सीधे
श्मशान पहुँचा दिया जाएगा और…
शायद तुम्हारे अपने लोगों के लिए अंतिम दर्शन भी संभव न हो!!!
परिवार को बस एक मृत्यु प्रमाणपत्र…
खेल ख़त्म…

यह संदेश दिल में चुभ जाता है। ज़िंदा रहा तो देश के लिए लड़ूँगा—ऐसा सोचने वाला मैं—यह संदेश दर्दनाक मौत की तस्वीर आँखों के सामने रख देता है। अस्पताल को किया हुआ देहदान भी काम आया—यह सोचकर विवश हो जाता हूँ। यह संदेश झकझोर देता है। खैर, ऐसा हुआ भी तो किसे क्या फ़र्क पड़ेगा? पिता, पत्नी और रिश्तेदारों की मौत देख चुका मैं सोचता हूँ—मरने के लिए भी कोई बहाना चाहिए होता है; वह बहाना—कोरोना…

संदेश आगे भी है, पढ़ता हूँ—

बेचारा चला गया… अच्छा इंसान था।
इसलिए—
बिना कारण घर से बाहर न निकलें।
बाहरी दुनिया के मोह और बातों को हल्के में लेने की आदत छोड़ें।
याद रखें—
जीवन अनमोल है।
इसलिए—घर में रहें—सुरक्षित रहें।
पढ़ लेने के बाद मेरी तरह कॉपी–पेस्ट करें।
वह दिन नहीं आएगा—ऐसा कहा नहीं जा सकता; सुरक्षित रहें।
घर में ही रहें (Stay Home)
सुरक्षित रहें (Stay Safe)

कैसा संदेश? जड़ों तक हिला देने वाली आँधी की तरह—मैं भीतर तक काँप रहा हूँ। यह नकारात्मक है या सकारात्मक?
२०७७ जेठ २, लॉकडाउन।

 

कोरोना का कहर विश्वव्यापी था—हाथ मिलाना मना, भीड़ जमा करना मना। मुलाक़ात और बातचीत बंद। स्कूल, कॉलेज, बसें, यातायात, सिनेमा हॉल, दफ़्तर, होटल, बाज़ार—सब बंद। इंसान मिला तो कोरोना फैला; कोरोना लगा तो मौत। दवा नहीं थी। इलाज कैसे? दुनिया भर में फैल गया। सीमाएँ बंद, आवाजाही बंद। लॉकडाउन—कड़ा लॉकडाउन।
लॉकडाउन, सीमा-सील, क्वारंटीन, आइसोलेशन, मास्क—विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफ़ारिशें। दुनिया को नष्ट करने वाले परमाणु हथियार थे, मिसाइलें थीं—पर कोरोना से लड़ने की दवा नहीं थी।

नया वायरस—क्या है? इलाज कैसे? कुछ पता नहीं। आँधी–तूफ़ान की तरह पूरी दुनिया में फैल गया। लाखों लोग मरे। मानव जाति पर वैश्विक संकट। महाशक्तियों से लेकर पिछड़े देशों तक—सब त्रस्त। मृत्यु का भय, आतंक—राष्ट्राध्यक्ष से लेकर आम आदमी तक—सबको सताए हुए था: आज मरेंगे या कल।

पूरा विश्व लॉकडाउन! स्कूल–कॉलेज, दफ़्तर, बाज़ार, यातायात—सब बंद; मिलना–जुलना, आना–जाना—सब बंद; घरों में क़ैद। लगता था—घर से बाहर निकले तो कोरोना पकड़कर मार ही डालेगा। कितने भयावह दिन—जब इंसान अकाल मृत्यु से सबसे ज़्यादा डर रहा था।

नेपाल भी कोरोना की चपेट में आया। कारख़ाने बंद, बेरोज़गारी—आमदनी न होने से कई लोग भूख से मरे।
गंध न आना, स्वाद न आना, साँस लेने में कठिनाई, खाँसी, भोजन अरुचिकर होना—ये लक्षण बताए जाते थे। एंटीजन टेस्ट न होने से पीसीआर टेस्ट कराना पड़ता था; स्वैब देने के दो दिन बाद ही रिपोर्ट आती। कोई बीमार हुआ तो कोई मिलने नहीं आता।

बचाव के तमाम उपायों के बावजूद रूपसी बीमार पड़ गई। पीसीआर रिपोर्ट पॉज़िटिव आई। मोहल्ला सील कर दिया गया। अस्पताल की एम्बुलेंस सायरन बजाती हुई आई; पीपीई पहने कर्मी उसे अस्पताल ले गए और आइसोलेशन में रखा। मरीज़ के साथ कोई नहीं जा सकता, मिल भी नहीं सकता। खाना नर्सों को दिया जाता—मरीज़ ने खाया या नहीं, यह भी पता नहीं।

दो हफ़्ते बाद फ़ोन पर खबर आई—रूपसी का निधन हो गया। बिख्यातमान और बच्चे दौड़कर अस्पताल पहुँचे। वे शव देखना चाहते थे—काँच की छोटी खिड़की से प्लास्टिक में लिपटा शव दिखा। वे कफ़न देना चाहते थे—पर पीपीई पहने सैनिकों ने मना कर दिया। कोरोना से मरे सभी शवों का अंतिम संस्कार पीपीई, दस्ताने और चश्मा पहने सैनिकों ने—खुदी हुई खाई में—कर दिया।
कितनी करुण मृत्यु! अंतिम क्षणों में न मरीज़ अपने लोगों को देख सका, न अपने लोग मरीज़ को; न दाह-संस्कार का अवसर—दर्दनाक बिछोह!

 

नौरंगी

दुख से मुक्त होने पर इंसान सात रंगों की रंगीन दुनिया में खो जाता है। सात रंग—इंद्रधनुष के। और दो रंग?—नौरंगी दाँफे।
सात के अलावा दो रंग और हैं—पहला, जब असह्य शोक जीवन में आता है, तो रंगहीनता के साथ शून्यता का अनुभव—रोती आँखों से दिखने वाला आठवाँ रंग।
नवाँ रंग—अनेक दुख, दर्द, कष्ट, रिक्तता, अभाव, पीड़ा, आघात, संताप, यातना, बिछोह के बीच भी जीने की इच्छा—उस जिजीविषा का अद्भुत, रहस्यमय, अदृश्य रंग।
इस तरह जीवन नौरंगी हो जाता है—और नौरंगी जीवन में सब कुछ नौरंगी ही होता है।

रूपसी के देहावसान ने बिख्यातमान के सात-रंगी जीवन को नौरंगी बना दिया। नौरंगी जीवन की शुरुआत—31 वर्षों का सुखी दाम्पत्य जैसे सपना हो गया। रूपसी की पीड़ादायक मृत्यु— पूछा जा सका कहाँ दर्द है; न सेवा कर पाए; न अंतिम संस्कार—ये बातें उसके मन में चुभती रहीं। आँसू बहते रहे, पर मन का दर्द धुल न सका।

स्कूल बंद; घर में बस पिता और दो बच्चे। मामा दो साल पहले ही अपने गाँव लौट चुके थे। पत्नी के बिना घर—घर नहीं लगता। मन में शून्य—घर भी शून्य। हर समय रोता मन; खुलकर रो भी न सका—लॉकडाउन था। न कोई आता, न कहीं जाना। पंख कटे पक्षियों-से वे थे। बच्चों के सामने कमज़ोर नहीं पड़ना चाहता था।

शिकायतें बहुत थीं—सुने कौन? रूपसी नहीं थी। मन में विषाद रह गया। काश अस्पताल में वेंटिलेटर होता—तो शायद रूपसी बच जाती!
पड़ोसी देश ने पीपीई, दस्ताने, चश्मे, वेंटिलेटर, मास्क—मुफ़्त मदद दी थी। कमीशन न मिलने से भ्रष्ट सरकार ने समय पर नहीं मँगाया; यदि समय पर आता—तो शायद रूपसी की जान बच जाती। बिख्यातमान भीतर ही भीतर क्रोधित हुआ। आपदा में भी कमाई करने वाले भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई—अकाल में मरी रूपसियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

 

 

कोरोना नियंत्रण के लिए टीके बने। लॉकडाउन के बाद लोग फिर सांसारिक गतिविधियों में लौटे। बीते दो वर्षों की पीड़ादायक अवस्था ने बिख्यातमान को राजनीति की त्रुटियों पर सोचने को मजबूर किया।
गंदी राजनीति से भ्रष्टाचार फैला, हर क्षेत्र दुर्गंधित हुआ। विकास न होने का कारण—राजनीति की उलटी दिशा—यह उसका निष्कर्ष था। आम आदमी की हालत तभी सुधरेगी, जब विश्व राजनीति सही दिशा पकड़ेगी। राजनीति अच्छी होती, तो रूपसी जैसी लोग अकाल मृत्यु का शिकार न होते और उज जैसे लोग इतने बड़े दुःख-सागर में न डूबते।
मानव जीवन में दुःख का कारण—उलटी, गंदी राजनीति है।
अच्छी राजनीति गंदी राजनीति को विस्थापित कर धरती को सुंदर, रमणीय और जीवन को सहज बना सकती है।

 

 

 

५. अनुभव और अनुभूति

 

तुम हमेशा के लिए छोड़कर चली गईं,
तो तुम्हें देखने आने का कोई रास्ता कहाँ है?

 

बिख्यातमान ने सोचा—मैं अभी किस स्थिति में पहुंचा हूँ। उसने अपने जीवन के अनुभव और अनुभूतियों का मूल्यांकन किया। अपने आप पर हंसा और रोया भी।
अब उसकी बातें सुनकर उसे साथ देने वाली प्यार भरी पत्नी कहाँ है! खुद अकेले जीवन जीना होगा; अकेले ही इसे बिताना होगा। बच्चों की अपनी दुनिया है। मां के साथ वे जितने आत्मीय होते, पिता के साथ वैसा नहीं होता। उनका जीवन उनका है, हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

इंटरनेट के जाल में उलझा हुआ संसार; जन्म से ही मोबाइल हाथ में। मोबाइल में ही उनका समय बीतता है, मोबाइल एक दुनिया है! वह भी मोबाइल और लैपटॉप पर समय बिताता है। अगर वह इन सामाजिक नेटवर्क्स पर नहीं होता तो वह शायद डिप्रेशन में चला जाता।

वह जन्मा दूरदराज के दुर्गम गांव में; नदी किनारे के सुकुम्बासी बस्ती में। परिवार के पास पेट भर खाने को नहीं था। भलबाढ़ी ने परिवार बहा दिया। वह बचा अकेला। धन्यवाद, बड़ी दीदी! बड़ी दीदी कहाँ होंगी? हैं या नहीं? इंसान की उम्र का क्या भरोसा… अगर हैं तो मिल पाएं? बिख्यातमान के आँसू अचानक छलक पड़े।
(
बड़ी दीदी! जहाँ भी हों, खुश रहें; नहीं हैं तो भावपूर्ण हार्दिक श्रद्धांजलि!)

क्या वह बस्ती सच में वैसी थी? नदी किनारे की वह सुकुम्बासी बस्ती, बचपन। 'नदी में मत जाना', मां-बाप की चेतावनी। उनके चेहरे भी उसके मन में धुंधले अस्पष्ट रूप में आए। नदी की भलबाढ़ में बहती मां, पानी पर हाथ उठाए बह रही। यह उसने बार-बार अपने सपनों में देखा था। उस समय न तो मां-बाप-भाई-बहनों के शव मिले, न शव को संस्कार करने का अवसर मिला। रूपसी के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसने लंबी आह भरी। उफ, मेरा कैसा जीवन है!

वह छोटे भाई और परिवार के चेहरे भी याद नहीं कर पाया। अपने परिवार से भागते हुए वह रहस्यमयी आश्रम पहुँचा। भगवती, गुरु, शिष्य... उसने अचेत होने और पागलपन सीखना वहाँ सीखा। आज वह ऐसा कर सकता है या नहीं? प्रयोग करना चाहता था, पर अगर अचेत होकर पागल न हुआ तो रूपसी को लगातार याद कौन करेगा? अकाल में रूपसी जैसे लोगों की जान जाने वाली परिस्थितियों का अंत करने की उसकी इच्छा किससे पूरी होगी?

फिर रूपसी उसकी याद में आई। उनके साथ बिताए वर्ष उसके जीवन के सर्वोत्तम सुखद दिन थे। अब उसका जीवन आम लोगों के जीवन को सुधारने और सरल बनाने की दिशा में था।

बिख्यातमान पहले भी कभी-कभी साहित्यिक रचनाएँ करता था। उसने रूपसी को एक कहानी सुनाई, जिसे रूपसी ने ‘आँसू आने जैसी’ टिप्पणी की, तो वह प्रसन्न हुआ। मेरी भी कहानी लिखो,” एक बार उन्होंने कहा था। कैसी कहानी?” पूछने पर उन्होंने कहा, “मैं बताऊँगी। अब वह नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी वह लिखेगा, उसने सोचा।

नौरंगी अकेले जीवन में बिख्यातमान का मन यादों के विशाल आकाश में तैरता रहा।
(
मैंने सांसारिक जीवन का हर स्वाद अनुभव किया। दुख और सुख का अनुभव किया। अगर रूपसी से पहले मैं मर जाता, तो अपने सबसे प्यारे व्यक्ति की मृत्यु से मिलने वाला असह्य दर्द नहीं जान पाता। ‘अपरिणीय क्षति’ क्या होती है, जान लिया। संसार दुःखी लोगों की आँखों से बहते आँसुओं के महासागर में तैरता अनुभव किया। रोते हुए लोगों को देखकर ‘बच्चे रोते हैं’ समझते थे। लेकिन पत्नी की मृत्यु पर मैं रोया। मैंने अनुभव किया, आँसू की गहराई, भार, आकार और प्रकृति। क्यों लोग रोते हैं, जान पाया। आँसू क्या है, क्यों बहता है, समझ पाया।

रूपसी ने मुझे सब कुछ दिया। मुझसे पहले मरीं, और नौरंगी जीवन में मुझे जीवन के नियम भी सिखाया।)

आँसू दिए। आँसू क्या हैं?
आँसू दूसरों की आँखों में पानी। दुश्मन की आँख के आँसू आनंद। बच्चों की आँखों के आँसू अभिव्यक्ति—भूख, प्यास, नींद या अन्य असुविधा व्यक्त करने का माध्यम। दूसरों के आँसू देखकर आँसू का अर्थ नहीं समझ आता। केवल अपनी आँख से बहा हुआ असह्य दर्द का आँसू ही इसके मर्म और मूल्य का अनुभव कराता है। यह बिख्यातमान ने अनुभव किया, और उसका जीवन बदल गया।

 

६. मन और तन

उत्कर्ष अनुभव करने के बाद प्रेम समझ आया, मन कह पाता,
प्रेम में भीगकर, गलकर, थरथराकर तन झर सकता।

मन अद्भुत होता है। कहते हैं बांधो, पर कैसे बांधें? कहते हैं तह लगाओ, पर तह लगाना कैसे?
मन उस जगह पहुँच जाता है जहाँ नहीं पहुँचना चाहिए। समाज द्वारा वर्जित चीजों में आनंद लेता है। मन के लिए क्या वर्जित? क्या उपयुक्त? मन पसंदीदा करता है और नापसंद को नहीं करता। रूपसी के समय दो लोग मन की बातें साझा कर हल्के होते। खुश रहते। अब बिख्यातमान की मन की बातें कौन सुनेगा? मन की बातें मन में ही दब जाती हैं।

उसका बेचैन मन तन पर भी असर डालने लगा। मन प्रसन्न न होने पर तन भी सुन्न होने लगा।
तन बेचैन होकर मन से कहता, “ए मन, न बराल। तू बरालें तो मैं सूख रहा हूँ। मैं रहूँ तभी तू रहेगा। अगर मैं स्वस्थ हूँ, तब तू आनंदित हो सकता है।
हाँ, पर मैं तुझसा नहीं हूँ। तू पिंजरे में है तो मैं दूर हो जाऊँ। पिंजरे में फँसकर मरना नहीं चाहता। तू तन मेरा घर है, इसलिए मैंने कभी आत्महत्या का विचार नहीं किया। प्रियसी की मृत्यु में भी मन बाँध रखा है। तन बहुत कुछ जानता नहीं।

मन और तन लंबे समय तक अलग रहते। दोनों जानते हैं कि एक के बिना दूसरा नहीं। समझौता करते हैं। मुस्कुराकर एकाकार हो जाते। दुबला पड़ता बिख्यातमान फिर स्वस्थ हुआ। उसने और रूपसी के साथ बिताए सुख-दुःख की कहानियाँ लिखनी शुरू की। ऐसा करते हुए समय का पता ही नहीं चला। ‘अज्ञात समय का आनंद’ हर व्यक्ति की इच्छा होती है।

मन और तन मिलकर एकाग्रचित्त काम करें तो समय बिना पता चले आनंदपूर्वक बीतता है।

 

७. जीवन के चरण

आँसू और रक्त के पोखर में वीर योद्धा तैरते हैं।
सदा मृदुल लय में वीरतापूर्वक जीवन–गीत गाते रहते हैं।

अहो, नमस्ते मामा। मामा भी आए। खुशी हुई।
नमस्ते भांजा, आशिष। रूपसी के देहावसान की खबर पाते ही आना चाहता था, पर लॉकडाउन। अब आया।
कितना दुःखद… मामा ने आँसू पोंछते हुए कहा।
बेटी बिख्यातीरूपकला और बेटा रूपेशबिख्यात भी आए। चारों साथ, वातावरण उल्लासमय।

जीवन, जीवन के विभिन्न चरणों में गुजरते हुए अनेक अनुभव लेना पड़ता है, मामा।
किस तरह के चरण?”
जन्म से मृत्यु तक जीवन… हर दस वर्ष की आयु में चरण बदलते हैं। हर दस वर्ष के चरण में पाँच-पाँच साल के उपचरण और तह होती हैं। इन तहों के अनुसार मानसिक और शारीरिक स्थिति बदलती है।

जन्म के पहले नौ साल बच्चे—निष्कलंक, निर्दोष। चार साल से कम उम्र के छोटे बच्चे, यह उम्र जीवन की नींव डालने की। ५ से ९ साल की उम्र तीक्ष्ण मस्तिष्क की होती है—भाषा और नई चीजें सीखने की क्षमता वाली।

दस साल के बाद के चरण अलग होते हैं। १०–१९ साल के चरण में भी दो उपचरण—१०–१४ और १५–१९—मानसिक और शारीरिक विकास तीव्र होता है। इसी तरह (२०–२९), (३०–३९), (४०–४९), (५०–५९), (६०–६९), (७०–७९), (८०–८९), (९०–१००) तक के दस चरणों में भी पाँच-पाँच साल के उपचरणों के अलग-अलग गुण होते हैं। चरण अनुसार ही व्यक्ति को जीना पड़ता है। इन चरणों में मन और तन भी उसी अनुसार बदलते हैं। यही जीवन की सुंदरता है।

इतना कहकर वह चुप हो गया। उसका मन पाँचवें चरण पर भी रूपसी को न जी पाने पर दुखी था। उसने सोचा, वह किस चरण तक जी पाएगा?
जैसे पानी ढलान की ओर बहता है, मन आनंद, शांति और मनोरंजन की ओर आकर्षित होता है। पर मेरा मन मर चुकी या न मर चुकी रूपसी की याद में उलझा रहता है; शायद याद में ही मेरे लिए पीड़ादायक आनंद और पीड़ादायक शांति है…’

 

 

अध्याय—तृतीय
गलत रास्ता या सही रास्ता

 

१.                    दल और शक्ति

 

मन में दुख छुपाकर मुस्कुराने वाला महान व्यक्ति,
जीवन का हर पल, हर क्षण परीक्षा है।

 

दल और शक्ति हैं। आम लोग, भू-मानव यानी साधारण लोगों के बिना दल अकेले और निर्बल हैं। वे जीवित हैं या नहीं? दल की शक्ति से सत्ता तक पहुँचने वालों को उनकी चिंता नहीं होती। भ्रष्टाचार की हड्डी के लिए मर मिटते हैं। कुत्ते की तरह हड्डी चबाकर खाने के लिए कुत्ता बन जाते हैं।’

एकाकी बैठा बिख्यातमान यह सोच रहा था। इसी सोच के साथ उसे वह कविता याद आई, हड्डी’:

लोग भ्रष्टाचार की हड्डी खाने वाले कुत्ते बन गए हैं।
खुद बिक जाने के बाद देश बेचने को तैयार।
इनके पीछे दौड़ने वाले मूर्ख भी कुत्ते बने।
इंसान कहाँ मिलेगा? कुत्ते ही कुत्तों की दुनिया बन गए।

मनुष्य भ्रष्टाचार की हड्डी खाने वाला कुत्ता बन गया।

इंसान कहाँ मिलेगा? पूरा संसार मानवता से रहित हो गया, भ्रष्टाचार की हड्डी में खो गया वर्तमान। हड्डी खाने लगे तो—

विश्व रंगमंच पर केवल हम नाचें, दूसरों को नष्ट करें

उल्टा रास्ता! दासता न स्वीकारने वालों को माफ़ नहीं करें

 

विश्व पर कब्जा करने वाले युद्ध-उन्मादी लोग मानवता, भाईचारा और विश्वशांति को तबाह कर रहे हैं। युद्ध में विश्व के अनमोल साधन बर्बाद कर, गरीबी बढ़ाई जा रही है। गरीब और दुखी आम लोग तानाशाही सेनाओं के जूते तले कुचले जा रहे हैं, स्वतंत्र सोचने में असमर्थ और निरीह बन रहे हैं। दुनिया भर में सुपरपावर एजेंटों के माध्यम से पनपने वाली गंदी राजनीति थोप दी गई है।

बिख्यातमान सोच रहा था—उल्टी राजनीति को कैसे सही किया जा सकता है? उसने खुद को अकेला, गरीब और शक्तिविहिन आम व्यक्ति पाया। जब तक उनकी उन्नति नहीं होगी, राजनीति सही नहीं होगी। सही राजनीति के लिए आम लोगों की सोच सही होनी चाहिए। सोचने में असमर्थ और अनिच्छुक लोगों को कैसे सोचने योग्य बनाया जाए? वैज्ञानिक तरीके से सोचना कैसे सिखाया जाए? उल्टी राजनीति के भ्रम से कैसे मुक्त किया जाए?

बिख्यातमान, मामा और काजीलाल तीनों देश के कुछ मुख्य क्षेत्रों में गए। कुछ जागरूक लोगों से मिले और उनकी बातें ध्यान से सुनी।

सम्देन— “सही सोच की कमी। लोग सोच ही नहीं सकते। इसलिए सोचना नहीं चाहते। सही सोच के अभाव में अपनी स्थिति का पता नहीं चलता। उल्टी राजनीति में वे अंध भृगु-नौकर बने रहते हैं। यदि उन्हें अपने मालिक बनने का विचार नहीं होगा, तो वे हमेशा शोषण और उत्पीड़न में रहेंगे।

माङ्मा— “मन और तन। मन सोच है, तन व्यवहार। सोच के अनुसार व्यवहार। यदि मन का रास्ता उल्टा हो, तो यात्री तन का क्या होगा? उल्टी राजनीति मन को भ्रम और जाल में फँसा देती है। बिना सही सोच वाले मन के पीछे चलने वाला तन शहीद बन जाता है। मन को बरबाद करने वाली गंदी राजनीति। यदि मन अपने मालिक बनने का विचार न रखे, तो इंसान जीवनभर दूसरों का दास और खिलौना बने रहता है। पहले सोच सही होनी चाहिए। सही सोच और क्षमता के साथ मन और तन सही रास्ते पर चलना शुरू करेंगे।

धनकेशर— “आज तक की तथाकथित सभ्यता कुछ मुट्ठीभर चालाक लोगों ने अपने छोटे समूह की रक्षा के लिए बनाई। दर्शन, साहित्य, सोच और सामाजिक संरचना ने अधिकांश आम लोगों को भ्रम के जाल में फँसा रखा है। उनका सकारात्मक सोच के अभाव में जीवन असहाय और दास बन जाता है। वे केवल झुलसते हुए, असमर्थ और दास की तरह जीवन बिताते हैं।

माङ्मा— “मन और तन। इन दोनों के साथ ही इंसान सक्रिय रह सकता है। मन सोच है, विचार और दिशा देता है; तन उसका पालन करता है। मन की इच्छा के बिना तन कभी काम नहीं करता। अगर मन सही सोच रखे और तन उसके अनुसार चले, तब ही जीवन सही रास्ते पर जाएगा। पहले सोच असली और स्वतंत्र होनी चाहिए। लेकिन आज आम लोग सोचने की स्थिति में नहीं हैं। इसलिए वे दूसरों की सोच में फँसे हुए हैं। उन्हें सोचने योग्य बनाने के लिए सामान्य शिक्षा, ज्ञान और बुनियादी आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी।

 

फातिमा
तन और मन— इन दोनों का साथ मिले तभी मनुष्य सक्रिय रह सकता है। मन सोच है, विचार है और वही तन को दिशा भी देता है। मन जिसे स्वीकार न करे, वह काम तन करना नहीं चाहता। मन सोच है तो तन व्यवहार है। मन मार्ग है तो तन यात्री। सबसे पहले सोच का सही होना आवश्यक है।

लेकिन आज सामान्य लोग ऐसी स्थिति में हैं कि वे सोच ही नहीं पा रहे हैं। इसी कारण वे दूसरों की सोच के दास बन गए हैं। इसलिए सबसे पहले उन्हें सोचने की अवस्था तक पहुँचाना होगा—सामान्य शिक्षा, ज्ञान और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करके।

 

पेम्बा— “असत्य और भ्रम पर आधारित मुद्दों से आम लोगों को विभाजित किया गया है। उनमें घृणा पैदा करके एकजुट होने से रोका गया है, जबकि तानाशाह अपनी निचली राजनीति चलाते हैं।

चलते हुए बिख्यातमान ने एक पुस्तक पढ़ी, जिसमें एक लघुकथा ने अंधकार में उजाले का छोटा प्रकाश दिखाया। उसने इसे दूसरों को सुनाया।

अपना मालिक बनो
हम बहुत परामुखी और परास्रित हो गए हैं। हमारी सोच स्वतंत्र और वैज्ञानिक नहीं है, इसलिए हम गरीब हैं और दुखी हैं।
इससे मुक्ति कैसे मिलेगी?”
रामे और धन्वन्तरी यह चर्चा कर रहे थे। चारों ओर बैठे लोग भी ध्यान से सुन रहे थे। गणतंत्र की वजह से ही लोग ऐसे खुलकर चर्चा कर सकते हैं।

हमें अपने हित के लिए सामूहिक शक्ति बनानी होगी।
कैसे?”
गरीब और निम्न वर्ग के लोगों से परामर्श करके, एकजुट होकर हर जगह सहयोग करके।
राजनीति में भी?”
हाँ, राजनीति आधार है। वहीं से शुरुआत करनी चाहिए। आगामी स्थानीय चुनाव में अपने उम्मीदवार को जिताकर अपने हित की रक्षा करेंगे। साथ ही रोजमर्रा के काम—खेती, शादी, शिक्षा, स्वास्थ्य, त्यौहार, संस्कार—सबमें सहयोग से सामूहिक शक्ति बढ़ाएंगे। अब हम तानाशाहों से उम्मीद नहीं करेंगे। हम खुद अपने सपने साकार करेंगे।

सभी सहमत हुए।

इस तरह गरीब और निम्न वर्ग के लोगों में सामूहिक शक्ति बन गई। अब वे अपने मालिक हैं। उनकी सफलता देखकर अन्य गाँवों के गरीब और निम्न वर्ग ने भी सामूहिक शक्ति बनाना शुरू किया। अंततः देश के सभी नागरिक अपने मालिक बन गए। देश स्वार्थी ताकतों के कब्जे से मुक्त और सार्वभौम तथा सम्पन्न बन गया।

सुनकर सभी विचारमग्न हो गए।

 

कोरोना शुरू हो रहा था, उसी समय पड़ोसी देश ने कोरोना के विरुद्ध निःशुल्क दिए गए आवश्यक सामान उपलब्ध कराए थे, लेकिन तत्कालीन भ्रष्ट सरकार उन्हें समय पर नहीं ला सकी। संकट के समय भी भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के कारण रूपसी सहित अनेक लोगों की जान चली गई—यह बात बिख्यातमान अपने मित्रों और परिचितों से कई बार कह चुका था। ऐसे दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए, यह बात वह भ्रष्टाचार विरोधी अभियान’ के सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी लगातार कहता रहा।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान

इस अभियान में बड़ी संख्या में साधारण आम लोग सहभागी हो रहे थे। समर्थक देशभर में बढ़ते जा रहे थे। कार्यक्रमों का आयोजन स्थानीय आम लोग स्वयं करते थे और वक्ता के रूप में बिख्यातमान को आमंत्रित करते थे।

भ्रष्टाचार के कारण देश पिछड़ गया है और समस्त आम जनता दुःख झेल रही है। जब तक भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई नहीं होगी, तब तक भ्रष्टाचार नहीं रुकेगा। भ्रष्टाचारियों पर की जाने वाली कार्रवाइयाँ—सामाजिक बहिष्कार, भ्रष्टाचार के प्रमाणों सहित उन्हें समाज के सामने नंगा करना; और यदि इससे भी सुधार न हो तो काला-धब्बा लगाकर लिंचिंग और शारीरिक दंड तक देना पड़ेगा।

तालियाँ गूंज उठीं। बिख्यातमान ने मुट्ठी उठाकर तालियों का अभिवादन किया। अभियान व्यापक होने लगा तो बिख्यातमान, मामा, गोपीलाल, धन्वंतरी, रजनी और पेम्बा सभी अत्यंत व्यस्त हो गए। जुलूस, नारेबाज़ी और अनेक कार्यक्रम स्वतःस्फूर्त रूप से शहरों, बाज़ारों और गाँवों तक फैलने लगे।

कोरोना काल के कुछ भ्रष्ट मंत्री लिंचिंग का शिकार हुए। लिंचिंग में हुई बेइज़्ज़ती के कारण उन्होंने रात में अपने ही घर की छत से कूदकर आत्महत्या कर ली।
राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो गई। भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के हज़ारों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और शांति-सुरक्षा के नाम पर जेल भेज दिया गया। सरकार और सत्ता में बैठे दलों के माफिया तथा विजिलांटे, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के कार्यकर्ताओं के विरुद्ध जान से मारने पर उतारू हो गए। सरकारी तंत्र को भी पूरी तरह सक्रिय कर दिया गया।

मस्टर सुवर्णमान भी मंत्री बन चुके थे। उन्होंने बिख्यातमान को सावधान और सुरक्षित रहने की चेतावनी दी।
इसके बाद बिख्यातमान ने अकेले चलना छोड़ दिया। बाहर निकलते समय वह मामा को साथ लेकर ही चलता था।

भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के कई लोग राजनीतिक दल बनाने की बात कर रहे थे, लेकिन बिख्यातमान का मत था कि ऊपर से थोपे जाने वाली वर्तमान व्यवस्था को समाप्त किया जाना चाहिए। इसलिए दल का गठन नहीं हुआ। हालांकि, नीचे से—भूमि स्तर से—दल बनने की प्रक्रिया में उसने कोई बाधा नहीं डाली।

 

२. अवसान

दुःख के बिना मरने का कोई हॉस्पिस कहाँ है?
मृत्यु रहित अमर जीवन कहाँ है?

दिनदहाड़े, भीड़भाड़ वाले बाज़ार की सड़क पर बिख्यातमान और मामा पर गोलियाँ चलाई गईं। अफरा-तफरी मच गई। तीन हत्यारे थे, जिन्होंने चेहरे पर नकाब पहन रखे थे।

रक्त के तालाब में गिरे मामा पर एक हत्यारे ने सीने में फिर से गोली मारी। वह बिख्यातमान को भी निशाना बनाने ही वाला था कि दूसरे ने कहा—
गोली बेकार मत कर। दिख नहीं रहा, मर चुका है। शरीर से खून भी बहना बंद हो गया है।

इसके बाद वे बिना नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिल पर सवार होकर भाग गए।

पोस्टमार्टम के लिए शव अस्पताल ले जाया गया। मामा की मृत्यु हो चुकी थी।
बिख्यातमान, बचपन में सीखी गई समाधि की अवस्था के कारण गोली लगते ही स्वतः बेहोश होकर मृतवत हो गया था। अस्पताल में उसे होश आया। उसने अपने बेटे रूपेशबिख्यात और बेटी बिख्यातीरूपाकली को बुलाकर कहा—
मेरी दराज़ में एक लाल कॉपी है, वह गोपीलाल को दे देना।

होश में आते ही गोली के घाव से खून की धार बहने लगी। यह देखकर वह फिर से बेहोश होकर मृतवत हो गया। खून रुक गया।

बच्चे यह सोचकर प्रतीक्षा करते रहे कि शायद वह फिर से होश में आए,
लेकिन वह दोबारा कभी नहीं उठा।

 

३. सही सीधा रास्ता

काश, छोटे से दायरे में ही मन भर उड़ते-उड़ते मर पाता,
चलते रहना, भटकते रहना—थकने तक चल पाता।

रूपेशबिख्यात और बिख्यातीरूपाकली ने गुप्त रूप से लाल कॉपी गोपीलाल को सौंप दी। गोपीलाल ने उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा।

मानव जाति के आदिकाल से आज तक विकास की गति उल्टी दिशा में रही है। इस गति को सीधा किया जाए, तभी धरती शांत, सुंदर और सभी के हित में होगी।
विकास उल्टी दिशा में जा रहा है। सत्ता कुछ मुट्ठीभर लोगों के कब्जे में है। वे विश्व-कल्याण के बजाय सत्ता में टिके रहने के लिए उल्टा रास्ता अपनाते हैं। हथियारों के बल पर दूसरों को घुटने टेकवाकर स्वयं मालिक बनने की होड़ मची है। उसी दौड़ में भयावह और महंगे हथियारों के आविष्कार और निर्माण में विश्व के संसाधन झोंके जा रहे हैं, जबकि आम लोग बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति न होने से रोग, भूख और अभाव के शिकार हो रहे हैं।

आज तक का मानव विकास युद्ध-आधारित रहा है। इस युद्ध के इतिहास को शांति के इतिहास में बदलना होगा। हथियारों के बल पर दुनिया जीतने की एकांगी और हठधर्मी सोच मानवता को तेजी से महाविनाश की ओर ले जा रही है। युद्धोन्मादी उल्टी सोच को त्यागकर शांति की सुंदर, सीधी सोच ही मानवता को परमाणु महाविनाश से बचा सकती है। पशु प्रवृत्तियों को पराजित कर प्राकृतिक मानवीय प्रवृत्तियों से ही विश्व सुरक्षित रह सकता है। युद्ध का उल्टा रास्ता छोड़कर विश्व-भाईचारे, विश्व-बंधुत्व और शांति के सीधे रास्ते पर आगे बढ़ने से ही विनाश से बचा जा सकता है। हथियारों पर होने वाले असीम खर्च को रोककर वही संसाधन विश्व को सुंदर बनाने वाले कार्यों में लगाए जाएँ, तो सभी लोग सुखी होंगे। दुनिया एक मनोहर बगीचा बनेगी; सभी को भोजन, आवास, वस्त्र, शिक्षा और स्वास्थ्य-सुविधाएँ सहज उपलब्ध होंगी।

आज राजनीति कुछ युद्धोन्मादी, निकृष्ट लोगों के हाथों में शक्ति-केंद्रित गंदा खेल बन चुकी है। गंदी राजनीति आम लोगों को ‘इंसान’ नहीं मानती—उन्हें युद्ध के किराए के घोड़े, खरीदे-बेचे जाने वाले मतदाता, बिकाऊ मज़दूर, कीड़े-मकोड़े समझती है; पर इंसान नहीं मानती।

सोचो! सोच के बिना इंसान पशु-सा हो जाता है। इंसान बनने के लिए इंसान की तरह सोचना, जानना, समझना और उसी के अनुसार काम करना आवश्यक है। सोच के बिना व्यक्ति आँखों के बिना अंधे जैसा होता है—वह स्वयं अपने लक्ष्य की ओर बढ़ नहीं सकता। मन के बिना खाली शरीर दूसरे के इशारों पर चलता हुआ नौकर बन जाता है। बुद्धि के बिना मनुष्य कैसे स्वयं का मालिक बन सकता है?

आज राजनीति ‘ऊपर से थोपे जाने वाली’ गंदी राजनीति बन चुकी है। महाशक्तियाँ शीर्ष पर बैठकर अन्य देशों की राजनीति अपने अनुकूल ढालती हैं, दलाल और वफादार सरकारें बनवाती हैं, विश्व राजनीति को मुट्ठी में लेकर हथियारों और युद्ध के भय से विश्व संसाधनों को लूटती हैं—यही ऊपर से पनपने वाली राजनीति है।

अब तक मानव जाति ने विनाश के महापथ—दूसरों को मारकर स्वयं बचने—का रास्ता पकड़ा है। विश्व-मंच पर केवल स्वयं नाचने और दूसरों को नष्ट करने की नीति से हर ओर युद्ध भड़का है। हथियारों को शक्ति का स्रोत बनाने के बजाय विश्व-बंधुत्व, भाईचारे और शांति के सीधे रास्ते को अपनाकर—स्वयं भी जीने और दूसरों को भी जीने देने का मार्ग चुनकर—मानव दुख का अंत किया जा सकता है।

आम लोगों को इंसान न मानने की परंपरा ने उन्हें पशु-समान स्थिति में धकेल दिया है। उन्हें भ्रमित विचारों में उलझाकर सही सोच से वंचित रखा गया है। सोच के बिना इंसान, इंसान नहीं रहता। इंसान होने के लिए मनुष्य की तरह सोचना-विचारना, निर्णय लेना और उसी के अनुसार कार्य करना आवश्यक है। जब आम लोगों को सोचने का तरीका सिखाकर सही सोच से सक्षम बनाया जाएगा, तो धरती स्वतः शांत, सुखद, मनोहर और हराभरी हो जाएगी। आम लोगों की सोच जाग्रत होते ही राजनीति स्वच्छ, उजली और प्रिय बनेगी—आम लोगों के लिए और आम लोगों द्वारा संचालित। आम लोगों की भागीदारी वाली राजनीति सही रास्ते पर चल पड़ेगी। यही अच्छी राजनीति है—मानव कल्याण और सुरक्षित, उज्ज्वल मानव भविष्य।

लाल कॉपी पढ़कर गोपीलाल गहराई से प्रभावित हुआ। उसने लाल कॉपी के विचारों को आम लोगों की समझ की सरल भाषा में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया। उसे पढ़कर आम लोगों की सोच बनने लगी; उनकी आँखें खुलीं। हम स्वयं अपने मालिक बन सकते हैं—इस विचार के साथ वे एकजुट होने लगे।

 

४. सोच, साथ और नवयुग का उदय

जीवन को जितना भोगते जाओ,
उतना ही जीवन-रस का स्वाद गहराता जाता है।

आम लोगों ने आम लोगों का साथ पाकर स्थानीय और राष्ट्रीय नेतृत्व संभालना शुरू किया। ऊपर से थोपे जाने वाली गंदी राजनीति समाप्त हो गई।
आम लोगों की सोच और साथ से शांतिमय, स्वर्णिम युग का आरंभ हुआ।

 

५. उपसंहार

सब कुछ मृतकों के लिए नहीं, जीवितों और आने वाली पीढ़ियों के लिए किया जाता है। शरीर न रहे तो मन भी नहीं रहता; पर बिख्यातमान के शरीर के न रहने पर भी, जब तक शरीर और मन दोनों थे, दोनों ने मिलकर जो सोच लिपिबद्ध की—वह जीवित रही। बिख्यातमान चला गया; अब उसे और क्या चाहिए?

उसके बताए सोचने के तरीके और विचारों से आम लोगों ने सही सोच विकसित की। वे अनेक भ्रमों से मुक्त हुए, असत्य के पीछे दौड़ना छोड़ दिया और समतामूलक, शांतिमय संसार के निर्माण में लग गए। युद्ध से मुक्ति की आशा पनपने लगी। जब सभी देशों में सत्ता और सरकार आम लोगों के हाथों में आएगी और विश्व सही रास्ता अपनाएगा, तब सबका जीवन सुखमय होगा—यह विश्वास दृढ़ होने लगा।

यह सब लाल कॉपी की देन होने के कारण बिख्यातमान को मरणोपरांत सम्मान दिया गया। उसके सम्मान और विश्व को युद्ध की विभीषिका से सुरक्षित रखने के लिए लाल कॉपी का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया। विश्वभर के आम लोग एक होने लगे। उल्टा रास्ता छोड़कर सही रास्ते पर चलने के लिए—एक-दूसरे को, सभी मिलकर—साथ देने लगे।

लाल कॉपी की सोच ने लोगों को जीवन को समझने और देखने की दृष्टि दी। इस दृष्टि से साहित्यकार उसी विचारधारा पर साहित्य रचने लगे; पत्रकार उसी सोच के आधार पर घटनाओं और तथ्यों का विश्लेषण कर समाचार प्रस्तुत करने लगे; चित्रकार उसी अवधारणा को स्पष्ट करने वाली नई चित्रकलाएँ बनाने लगे; और उसी सोच पर आधारित आकर्षक, कलात्मक और प्रभावशाली फ़िल्में दर्शकों में विशिष्ट पहचान बनाने लगीं।

रेडियो, टेलीविजन, पत्र-पत्रिकाएँ और सामाजिक माध्यम—यूट्यूब, ट्विटर, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम, मेसेंजर, टिकटॉक आदि—लाल कॉपी के विचारों से रंगीन होने लगे। आम लोगों ने इस विचार को अपनी मुक्ति की सोच के रूप में अपनाया, जिससे राजनीति स्वच्छ, पारदर्शी और आम जन-हितकारी बन गई। विश्व-भाईचारा और विश्व-शांति स्थापित हुई। आम लोगों की सोच पर आधारित एकता ने युद्धोन्मादियों को सत्ता और सरकार से बाहर कर दिया। आम लोगों का जीवन सहज, रंगीन, सुंदर, स्वर्णिम और रमणीय बन गया। वे अपने जीवन के स्वयं निर्णयकर्ता बने—वे स्वयं अपने मालिक बन गए।

और—दुनिया भर के लोग स्वयं अपने मालिक बनते जा रहे हैं।

 

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२०७९ कार्तिक १९, धरान (5 November 2022 , Satureday
Dharan)

Email-  rai.saran50@gmail.com 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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